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‘बच्चा पालना किसी एक की जिम्मेदारी नहीं’, पैटरनिटी लीव पर SC ने केंद्र को दिया ये निर्देश
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‘बच्चा पालना किसी एक की जिम्मेदारी नहीं’, पैटरनिटी लीव पर SC ने केंद्र को दिया ये निर्देश

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सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे की देखभाल में पिता की भूमिका को जरूरी बताते हुए केंद्र से पितृत्व अवकाश (Paternity Leave) को एक सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने के लिए कानून बनाने का आग्रह किया है. मंगलवार (17 मार्च, 2026) को सुप्रीम कोर्ट ने एडॉप्शन में महिलाओं के लिए 12 हफ्ते के अवकाश का आदेश देते हुए केंद्र से इस पर भी विचार करने को कहा.

कोर्ट ने पैटरनिटी लीव को जरूरी बताते हुए कहा कि परवरिश किसी एक  की जिम्मेदारी नहीं है और भले ही बच्चे के विकास में मां की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, लेकिन पिता की भूमिका को नजरअंदाज करना अन्यायपूर्ण होगा.

जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने इस बात पर भी जोर दिया कि पैटरनिटी लीव का प्रावधान लैंगिक भूमिकाओं को तोड़ने में मदद करता है, पिताओं को बच्चे की देखभाल में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहित करता है, परवरिश की संतुलित समझ को बढ़ावा देता है और फैमिली और वर्कप्लेस में लैंगिक समानता को बढ़ावा देता है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि परवरिश सिर्फ माता या पिता की अकेली जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह एक साझा जिम्मेदारी है, जिसमें हर माता-पिता बच्चे के समग्र विकास में योगदान देते हैं. कोर्ट ने कहा कि समाज अक्सर मां की भूमिका को बच्चे के जीवन में सबसे जरूरी और अपरिवर्तनीय मानता है, जबकि पिता भले ही शुरुआती समय में मौजूद रहे, उनकी भूमिका उतनी अंतरंग या अनिवार्य नहीं मानी जाती.

कोर्ट ने यह रेखांकित किया कि पिता की भूमिका भी महत्वपूर्ण है, और इसे नजरअंदाज करना सही नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘पैटरनिटी लीव की आवश्यकता पर इस चर्चा के संदर्भ में, हम केंद्र सरकार से अनुरोध करते हैं कि वह पितृत्व अवकाश को एक सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने का प्रावधान लाए.’

कोर्ट ने कहा, ‘हम यह जोर देते हैं कि ऐसे अवकाश की अवधि इस तरह निर्धारित की जानी चाहिए कि यह माता-पिता और बच्चे दोनों की आवश्यकताओं के अनुकूल हो.’ सुप्रीम कोर्ट ने उस वक्त यह टिप्पणी की जब वह बच्चा गोद लेने पर महिलाओं के लिए 12 हफ्ते की मैटरनिटी लीव को लेकर दाखिल याचिका पर सुनवाई कर रहा था.

कोर्ट ने सोशल सिक्योरिटी कोड के उस प्रावधान को निरस्त कर दिया है, जिसमें सिर्फ तीन महीने तक के बच्चे को गोद लेने पर ही मां को 12 हफ्ते की मैटरनिटी लीव मिलती है.  कोर्ट ने कहा कि बच्चा गोद लेने वाली हर मां को 12 हफ्ते की मैटरनिटी लीव मिलनी चाहिए, भले ही बच्चे की उम्र कुछ भी क्यों न हो.

 

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