भारत के मुगल काल में बादशाह अकबर का शासन सिर्फ ताकत और विस्तार के लिए नहीं, बल्कि राजाओं और संतों के मन-मस्तिष्क को अपने अधीन करने के लिए भी प्रसिद्ध था. अकबर ने हिंदू धर्म के राजाओं, वैष्णव संतों और योगियों को अपने दरबार में बुलाने का प्रयास किया. लेकिन वैष्णव संत भक्ति में मग्न रहते थे और आमतौर पर राज्यों और बादशाहों से दूर रहते थे. इसी बीच कुछ राजा और राजकुमार ऐसे भी थे जिन्होंने अपने स्वाभिमान और धार्मिक स्वतंत्रता को कभी नहीं छोड़ा.
ऐसे ही एक शासक थे सिवाना के कल्याण सिंह रावलोत, जिन्हें कल्ला राठौड़ भी कहा जाता है. वे मारवाड़ के स्वर्गीय राजा मालदेव के पोते और मोटा राजा उदय सिंह के भतीजे थे. उस समय कल्ला राठौड़ सिवाना के जागीरदार थे. अकबर की अधीनता स्वीकार करने के बावजूद उन्होंने अपनी धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता बनाए रखी.
अकबर और हिंदू राजाओं के बीच टकराव
अकबर ने बूंदी के हाड़ा शासक से कहा कि उनकी बेटी का विवाह शहजादे सलीम से होना चाहिए. इस प्रस्ताव को सुनकर सभी हिंदू राजाओं ने अपनी नजरें नीची कर लीं, लेकिन कल्ला राठौड़ निर्भीकता से अकबर की ओर देखने लगे. उन्होंने साफ कहा कि मेरी राजकुमारी का विवाह सिर्फ मेरे साथ होगा. अकबर समझ गया कि यह राजकुमार झुकने वाला नहीं है. कल्ला राठौड़ ने अंततः अपनी राज्य की राजकुमारी से विवाह किया और इस तरह हिंदू नारी की अस्मिता की रक्षा की.
लाहौर का मोर्चा और वीरगति
कल्ला राठौड़ के इस कदम से अकबर क्रोधित हुए और उन्हें लाहौर के मोर्चे पर भेज दिया. युद्ध के दौरान कल्ला राठौड़ ने वीरता दिखाई. कहा जाता है कि उनका सिर कट जाने के बाद भी उनका धड़ लड़ाई करता रहा, जिससे दुश्मन भयभीत हो गए. उनके शौर्य और बलिदान की मिसाल राजस्थान के इतिहास और साहित्य में आज भी दी जाती है.
कविराज श्यामलदास ने अपने ग्रंथ ‘वीर विनोद’ में लिखा है कि कल्ला राठौड़ ने अपने प्राणों की आहुति देकर सिवाना की रक्षा की और अपनी वीरता से इतिहास में अमर हो गए. उनके बलिदान और पराक्रम के अनेक किस्से डिंगल भाषा की कविताओं और दोहों में संजोए गए हैं.
आज भी सिवाना के दुर्ग में कल्ला राठौड़ का सम्मान किया जाता है. हर साल उनके बलिदान और वीरता को याद करने के लिए समारोह आयोजित किया जाता है.
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