गुरुग्राम में चार साल की बच्ची के यौन उत्पीड़न मामले में अब तक की जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई है. बुधवार (25 मार्च, 2026) को केस से जुड़े गुरुग्राम पुलिस अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट ने कारण बताओ नोटिस जारी किया. माता-पिता की याचिका में बार-बार नाबालिग पीड़िता को परेशान करने, धीमी जांच और कमजोर धाराएं लगाने की शिकायत की गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने तथ्यों की पड़ताल के बाद पुलिस के कामकाज पर नाखुशी जताई.
सुप्रीम कोर्ट ने तीन महिला आईपीएस अधिकारियों- कला रामचंद्रन, नाजनीन भसीन और अंशु सिंगला की विशेष जांच टीम को जांच का जिम्मा सौंपा. कोर्ट ने पीड़िता के बयान को दरकिनार कर अपराध का कमजोर ब्यौरा लिखने के लिए गुरुग्राम की चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के सदस्यों को भी नोटिस जारी किया. कोर्ट ने पूछा है कि उन्हें पद से क्यों न हटा दिया जाए. पहले बच्ची के यौन उत्पीड़न की रिपोर्ट देने के बाद स्टैंड बदलने वाली मैक्स हॉस्पिटल की डॉक्टर को भी कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है. कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है कि पुलिस कमीश्नर से लेकर सब इंस्पेक्टर तक पूरा पुलिस प्रशासन आरोपियों को बचाने में लगा है.
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचौली की बेंच ने कहा कि पुलिस आरोपियों को बचाने की कोशिश कर रही है. कोर्ट ने कहा कि POCSO एक्ट की धारा 6 के तहत अपराध का प्रथम दृष्टया प्रमाण मौजूद था, फिर भी पुलिस ने सिर्फ धारा 10 के तहत मामला दर्ज किया क्योंकि इस धारा में कम गंभीर अपराध आते हैं. कोर्ट ने सख्त शब्दों में कहा, ‘यह एक स्पष्ट मामला है, जहां पुलिस ने आरोपी को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किए.’
सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, ‘पुलिस कमीश्नर से लेकर सब इंस्पेक्टर तक पूरे पुलिस प्रशासन ने यह साबित करने की कोशिश की कि या तो नाबालिग के पास आरोपियों के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं या उसके माता-पिता जो बातें कह रहे हैं, उनका कोई मतलब ही नहीं. हालांकि, रिकॉर्ड से इस बात में कोई संदेह नहीं है कि यह अपराध पोक्सो के सेक्शन 6 के तहत आता है, जबकि पुलिस ने एफआईआर दर्ज की और अज्ञात कारणों से इसे धारा 10 के तहत कम श्रेणी में डाल दिया.’
कोर्ट नाबालिग पीड़िता के माता-पिता की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें हरियाणा पुलिस की जांच पर असंतुष्टी जताते हुए सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) या स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) से जांच की मांग की गई है. कोर्ट ने जांच के दौरान पुलिस की प्रक्रिया में भी कई समस्याओं को उजागर किया है, जिसकी वजह से पीड़िता को दोबारा आघात पहुंचा. कोर्ट ने कहा कि गुरुग्राम पुलिस की जांच में लापरवाही, गैर-जिम्मेदाराना रवैये, असंवेदनशीलता और अपनाई गई पूरी तरह से गैरकानूनी जांच पद्धति ने नाबालिग की पीड़ा को और बढ़ाया है.
(निपुण सहगल के इनपुट के साथ)
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