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अमेरिका-यूरोप के झगड़े में भारत को कितना फायदा, क्यों पछताएंगे ट्रंप? समझें पूरा गणित
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अमेरिका-यूरोप के झगड़े में भारत को कितना फायदा, क्यों पछताएंगे ट्रंप? समझें पूरा गणित

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अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ग्रीनलैंड के नाम पर यूरोपियन यूनियन के साथ जो झगड़ा शुरू किया है, उसका सीधा फायदा भारत को होता हुआ दिख रहा है. टैरिफ की धमकी देकर पूरी दुनिया को परेशान करने वाले ट्रंप से अब सबको छुटकारा पाना है. लिहाजा बिना अमेरिकी मदद के ही यूरोपियन यूनियन अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता है और इसके लिए उसने भारत के साथ जो व्यापारिक समझौता किया है, उसे यूरोपियन यूनियन और भारत दोनों की तरफ से मदर ऑफ ऑल ट्रेड डील कहा गया है.

हालांकि इसमें सवाल है कि इससे क्या बदल जाएगा. क्या इससे सच में भारत को कोई फायदा होगा? क्या इस डील की वजह से यूरोपियन यूनियन के देश खुद को अमेरिकी दबाव से मुक्त कर पाएंगे? क्या ऐसे फैसले करके ट्रंप भी अपने पुराने नेताओं जैसे रिचर्ड निक्सन और फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट की उस कतार में खड़े हो गए हैं, जिनकी आर्थिक नीतियों ने अमेरिका ही नहीं, बल्कि दुनिया को भी परेशान कर दिया था. 

पहले भी दुनिया को परेशान कर चुका है अमेरिका

अभी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप जिस तरह से टैरिफ लगाकर तमाम देशों को परेशान कर रहे हैं, वैसा ही परेशान कभी रिचर्ड निक्सन ने किया था. तब दुनिया की अर्थव्यवस्था ब्रेटन वुड्स प्रणाली के तहत चल रही थी, जिसमें अमेरिकी डॉलर को सोने के साथ जोड़ा गया था. सोने को तब $35 प्रति औंस की दर से बदला जा सकता था. जो दूसरे देश थे, उनकी मुद्रा डॉलर से जुड़ी थी. यानी कि अगर किसी देश को अमेरिका से सामान खरीदना है तो सामान के बदले वो उसे डॉलर न देकर सोना भी दे सकते थे, लेकिन 15 अगस्त, 1971 को अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने कहा कि यूएस अब डॉलर के बदले सोना नहीं देगा.

नतीजा ये हुआ कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था बदल गई और तब नए सिरे से डॉलर के मुकाबले दुनिया की दूसरी मुद्राओं का रेट तय किया जाने लगा जो फ्लोटिंग था यानी कि बदलने वाला था. तब निक्सन ने ट्रंप जैसा ही एक और काम किया था. उन्होंने विदेशी सामानों पर 10 फीसदी का सरचार्ज लगा दिया. फ्रैंकलीन डी रूजवेल्ट भी ट्रंप की तरह ही आर्थिक नीतियां बदलने और अमेरिकी संस्थाओं खास तौर से कोर्ट से टकराने के लिए जाने गए थे. यही वजह है कि दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम में यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने 1971 का वक्त याद करते हुए खुद को अमेरिकी दबदबे से मुक्त होने की बात कही.

यूरोप से टकरा रहे डोनाल्ड ट्रंप

हालांकि ट्रंप तो इन दोनों से भी कई गुना आगे निकले. उन्होंने मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के लिए न सिर्फ पूरी दुनिया को टैरिफ के जरिए परेशान किया, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति रहे जेम्स मुनरो के डॉक्टरीन के साथ थोड़ी छेड़-छाड़ करके उसे अपना बनाया और नया नाम दे दिया डोनरो डॉक्टरीन. इसमें अपना शुरुआती नाम और मुनरो के आखिरी नाम को इस्तेमाल कर बनाया और कहा कि अब अमेरिका पश्चिमी गोलार्ध यानी कि वेस्टर्न हेमिस्फेयर का सर्वेसर्वा बनेगा. ग्रीनलैंड पर कब्जे की बात इसी वेस्टर्न हेमिस्फेयर पर अपना दबदबा बनाने की है, जिसके लिए वो यूरोपियन यूनियन से टकरा रहे हैं. जब ट्रंप भी दवोस में आयोजित उस वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम में पहुंचे तो उन्होंने कह दिया कि यूरोप सही दिशा में नहीं जा रहा है.

यूरोपियन यूनियन को मिला भारत का सहारा

ट्रंप ने जब इतनी तबाही मचाई है तो जाहिर है कि यूरोपियन यूनियन को रास्ता निकालना ही था. यूरोपियन यूनियन को वो रास्ता भारत में मिला, जहां दोनों के बीच एक फ्री ट्रेड एग्रीमटें (FTA) अपने अंतिम चरण में है. भारत की ओर से कैबिनेट मंत्री पीयूष गोयल ने इसे मदर ऑफ ऑल ट्रेड कहा है तो यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने भी इसे मदर ऑफ ऑल ट्रेड ही कहकर बुलाया है. ये समझौता कितना मजबूत है और कितना कारगर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा भारत के गणतंत्र दिवस यानी कि 26 जनवरी के समारोह के मुख्य अतिथि हैं.

ऐसे में सवाल तो ये बनता है कि भारत और यूरोपिनय यूनियन ट्रेड डील कर भी लेंगे तो ट्रंप को फर्क क्या पड़ेगा? इसका जवाब इसी डील में है. डील से जो हासिल होगा, उसे ध्यान से सुनिएगा.

  • इस समझौते के जरिए दुनिया की लगभग 25 फीसदी जीडीपी एक साथ आ जाएगी, जो मिलकर कारोबार करेगी.
  • इस समझौते के जरिए दुनिया के करीब 2 अरब लोगों का बाजार एक साथ आ जाएगा.
  • भारत पर टैरिफ लगाकर जिस एक्सपोर्ट को अभी ट्रंप ने प्रभावित किया है, उसके लिए भारत को नया बाजार मिलेगा. इसके जरिए भारत का कपड़ा, चमड़ा, आभूषण और हस्तशिल्प का सामान यूरोपीय देशों में बिल्कुल Duty-free पहुंचेगा, जबकि अभी इसके लिए 10 फीसदी का टैक्स लगता है. ट्रेड डील फाइनल होगी तो ये टैक्स हट जाएगा.
  • यूरोप से जो सामान भारत आता है, जैसे यूरोपीयन वाइन, स्पिरिट्स, डेयरी प्रोडक्ट, ऑटोमोबाइल सेक्टर जैसे कार और महंगी बाइक्स, उनपर इंपोर्ट ड्यूटी कम हो जाएगी तो उनकी कीमत भारत में सस्ती हो जाएगी.
  • ट्रेड डील होगी तो भारत के आईटी प्रोफेशनल्स और दूसरे स्किल्ड लोगों का यूरोप जाना, वहां काम करना और पैसे कमाना आसान हो जाएगा. क्योंकि ट्रेड डील के बाद नियम इतने सख्त नहीं रह जाएंगे.

भारत-EU के बीच डील से दोनों देशों को होगा फायदा

ये डील बस इसी मामले तक सीमित नहीं होगी, बल्कि जब भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच कारोबार बढ़ेगा, रिश्ते सहज होंगे तो फिर रक्षा सौदे से लेकर साइबर सिक्योरिटी, मैरिटाइम सिक्योरिटी और आतंकवाद के खिलाफ भी अच्छी खासी मदद मिलेगी. यानी कि यूरोपियन यूनियन और भारत दोनों को फायदा ही फायदा होगा, लेकिन इसमें ट्रंप का घाटा क्या है. अमेरिका का घाटा क्या है, समझना तो इसको भी पड़ेगा, क्योंकि भारत और यूरोपियन यूनियन डील करें और ट्रंप को कोई फर्क भी न पड़े तो फिर फायदा ही क्या है इतनी बड़ी डील का. तो ट्रंप पर असर तो होगा. कैसे, चलिए इसको भी समझते हैं.

अभी तक ग्लोबल ट्रेड की जो करेंसी है, वो डॉलर है. कोई देश कुछ खरीद या बिक्री डॉलर में ही कर पाएगा. दुनिया में जितना भी कारोबार होता है, उसका 80 फीसदी से भी ज्यादा कारोबार डॉलर में ही होता है, जबकि यूरोपियन यूनियन के जो 27 देश हैं, उनमें से 20 देश डॉलर नहीं, बल्कि यूरो में अपना सामान बेचते-खरीदते हैं. अगर इस ट्रेड डील के जरिए यूरोपियन यूनियन और भारत एक दूसरे की मुद्राओं के साथ खरीदारी करने लगें फिर डॉलर पर निर्भरता कम होगी. यूरोप सामान बेचे तो भारत रुपये में खरीदेगा, भारत सामान बेचेगा तो यूरोप यूरो में खरीदेगा और तब दुनिया की करीब एक चौथाई जीडीपी के लिए डॉलर की जरूरत बेहद सीमित हो जाएगी.

यूरो और रुपया होगा मजबूत

ऐसे में यूरो भी मजबूत होगा और रुपया भी. तो डॉलर की दादागिरी कम तो होगी. बाकी भारत भी अपने तईं डॉलर के दबदबे से खुद को फ्री करना चाहता है. तभी तो यहां वोस्ट्रो अकाउंट की शुरुआत हुई है. आरबीआई ने विदेशी बैंकों से कह दिया है कि वो भारत में स्पेशल रुपी वोस्ट्रो अकाउंट खोलें. इससे भारत रुपये में ही कारोबार करेगा. यानी कि अगर भारत को किसी देश से कुछ खरीदना है तो वो देश भारत को रुपये में ही सामान बेचेगा. इसी रुपये का इस्तेमाल करके वो देश भारत से अपने लिए जो सामान चाहिए खरीद लेगा. फिलवक्त रूस, श्रीलंका, यूएई और जर्मनी सहित 22 से अधिक देशों ने भारत के साथ रुपये में व्यापार करने के लिए सहमति जता दी है.

ऐसे में अगर यूरोपियन यूनियन के साथ ये ट्रेड डील शुरू हो गई और साथ ही वोस्ट्रो अकाउंट के जरिए भारत रुपये में कारोबार करने लगा तो फिर ट्रंप को दिक्कत होगी. वो डॉलर के दबदबे के बल पर मेक अमेरिका ग्रेट अगेन बनाने का सपना तो देख रहे हैं, लेकिन यूरोपियन यूनियन से अमेरिकी दबदबे से निकलने और आत्मनिर्भर होने की ओर जो कदम बढ़ाए हैं, उससे ट्रंप के सपनों को बड़ा झटका लग सकता है, क्योंकि उन्होंने अपनी टैरिफ की जिद में दुनिया का एक बड़ा बाजार खो दिया है. अमेरिकी की यूरोपियन यूनियन के साथ जो ट्रेड डील होने वाली थी, दवोस में ट्रंप के भाषण के बाद उसपर भी वोटिंग रुक गई. ऐसे में ये डील भी अमेरिका के हाथ से निकलनी तय मानी जा रही है.



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