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‘जमीन मालिकों का हक पहले…’, सुप्रीम कोर्ट ने NHAI की याचिका खारिज की, जानें क्या है मामला?
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‘जमीन मालिकों का हक पहले…’, सुप्रीम कोर्ट ने NHAI की याचिका खारिज की, जानें क्या है मामला?

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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) की उस समीक्षा याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें 2019 के ‘तरसेम सिंह’ फैसले को केवल भविष्य (प्रॉस्पेक्टिव) में लागू करने की मांग की गई थी. कोर्ट ने साफ किया कि यह फैसला पिछली तारीख से (रेट्रोस्पेक्टिव) लागू रहेगा और जमीन मालिकों को सोलैटियम और ब्याज का अधिकार मिलेगा.

क्या था मामला?
NHAI ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा था कि 2019 के ‘तरसेम सिंह’ फैसले, जिसमें नेशनल हाईवे एक्ट के तहत जमीन अधिग्रहण पर सोलैटियम (अतिरिक्त मुआवजा) और ब्याज देने की बात कही गई थी, उसे केवल भविष्य में लागू किया जाए, लेकिन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने 2025 के उस फैसले की समीक्षा से इनकार कर दिया, जिसमें इस निर्णय को रेट्रोस्पेक्टिव माना गया था.

कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि NHAI द्वारा बताए गए लगभग 29,000 करोड़ रुपये के वित्तीय बोझ को आधार बनाकर जमीन मालिकों को ‘उचित मुआवजे’ के संवैधानिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सोलैटियम और ब्याज देना ‘न्यायपूर्ण मुआवजे’ का हिस्सा है और इसे सिर्फ आर्थिक बोझ के आधार पर नहीं रोका जा सकता.

किन मामलों में नहीं खुलेगी पुरानी फाइल?
कोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में 28 मार्च 2015 से पहले मुआवजे की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और वे अंतिम रूप ले चुके हैं, उन्हें दोबारा नहीं खोला जा सकता. यह तारीख इसलिए अहम है क्योंकि इसी दिन 2013 का भूमि अधिग्रहण कानून (RFCTLARR Act) राष्ट्रीय राजमार्ग अधिग्रहण पर लागू हुआ था.

किन्हें मिलेगा फायदा?
जिन जमीन मालिकों के मुआवजे से जुड़े मामले 28 मार्च 2015 तक लंबित थे, उन्हें सोलैटियम और ब्याज का लाभ मिलेगा. जिन मामलों में मुआवजा बढ़ाया गया, लेकिन सोलैटियम और ब्याज पर फैसला नहीं हुआ, वे भी दावा कर सकते हैं (कानूनी नियमों के तहत). हालांकि, ब्याज केवल उसी तारीख से मिलेगा, जब सोलैटियम या ब्याज की मांग की गई थी.

कोर्ट ने क्या संतुलन बनाया?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जमीन मालिकों को उनका हक मिलना जरूरी है, लेकिन साथ ही ‘लिटिगेशन की फाइनलिटी’ (मामलों का अंतिम निपटारा) भी बनाए रखना जरूरी है. कोर्ट ने कहा कि अलग-अलग मामलों में लोग पहले ही आर्बिट्रेशन या कोर्ट के जरिए अपने अधिकारों के लिए लड़ चुके हैं, और जो फैसले तय समय में अंतिम हो चुके हैं, उन्हें दोबारा नहीं खोला जा सकता.

अतिरिक्त स्पष्टीकरण और SG की मांग
फैसले के बाद सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट से यह भी स्पष्ट करने की मांग की कि ब्याज नेशनल हाईवे एक्ट की धारा 3H के तहत दिया जाए. हालांकि, CJI सूर्यकांत ने कहा कि ऐसा स्पष्टीकरण ‘तरसेम सिंह’ के पहले के फैसलों (Tarsem Singh-I और II) से टकराव पैदा करेगा, इसलिए इसे स्वीकार नहीं किया गया.



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