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4 साल की बच्ची से यौन उत्पीड़न मामले में पुलिस और मजिस्ट्रेट की असंवेदनशीलता पर SC चिंतित
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4 साल की बच्ची से यौन उत्पीड़न मामले में पुलिस और मजिस्ट्रेट की असंवेदनशीलता पर SC चिंतित

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हरियाणा के गुरुग्राम में 4 साल की बच्ची से यौन उत्पीड़न के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रवैया अपनाया है. बच्ची के माता-पिता ने पुलिस और मजिस्ट्रेट की तरफ से असंवेदनशीलता बरते जाने का आरोप लगाया था. कोर्ट ने जांच अधिकारी बदलने का संकेत दिया है. साथ ही, माता-पिता के आरोप पर मजिस्ट्रेट से स्पष्टीकरण भी मांगा है.

शुक्रवार (20 मार्च, 2026) को वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने मामले को चीफ जस्टिस सूर्य कांत के सामने रखा था. उन्होंने बताया था कि मामले में घरेलू नौकरानी समेत कुछ लोग शामिल हैं. लेकिन किसी को भी गिरफ्तार नहीं किया जा रहा है. रोहतगी के अनुरोध पर सुप्रीम कोर्ट ने मामले को सोमवार, 23 मार्च को सुनवाई के लिए लगाया. इस बीच पुलिस ने कुछ आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया था. लेकिन कोर्ट ने इसे नाकाफी पाया.

रोहतगी ने चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली 3 जजों की बेंच को बताया कि पुलिस और मजिस्ट्रेट का रवैया बच्ची को मानसिक आघात पहुंचाने वाला था. बच्ची को बार-बार पुलिस स्टेशन, अस्पताल और बाल कल्याण समिति ले जाया गया. वर्दी में पुलिस वाले उसके पास आते रहे. उसे आरोपियों की पहचान के लिए उनके सामने खड़ा किया गया, जबकि यह प्रक्रिया आरोपियों के फोटो के जरिए की जा सकती थी.

वरिष्ठ वकील ने मजिस्ट्रेट पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि मजिस्ट्रेट बच्ची से बार-बार ‘सच बोलो, सच बोलो’ कह रहे थे. बच्ची से पूछताछ आरोपियों की मौजूदगी में की जा रही थी. सुप्रीम कोर्ट ने इन बातों को बेहद चिंताजनक बताया. बेंच के सदस्य जस्टिस बागची ने चिंतित लहजे में पूछा कि इस दौरान बच्ची के साथ उसके माता-पिता थे या नहीं? रोहतगी ने बताया कि मां बच्ची के साथ थी.

चीफ जस्टिस ने मामले पर सख्त नाराजगी जताते हुए कहा, ‘एक 4 साल की बच्ची को यह किस तरह की असंवेदनशीलता का सामना करना पड़ रहा है?’ याचिका में बताया गया है कि पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने की बजाय परिवार से पूछा कि वह क्या चाहता है. यह किस तरह की कार्यप्रणाली है? हरियाणा सरकार के वकील ने बताया कि पहले एक महिला अधिकारी को जांच दी गई थी. उनके बारे में शिकायत को देखते हुए उन्हें हटा दिया गया है. अब थाना प्रभारी मामले को खुद देख रहे हैं.

रोहतगी ने बताया कि जो महिला अधिकारी पहले इस मामले की जांच कर रही थी, उसने माता-पिता को एफआईआर दर्ज न करवाने की सलाह दी थी. यह अधिकारी पॉक्सो एक्ट के एक मामले में घूस लेने के आरोप में पहले विभागीय कार्रवाई का सामना भी कर चुकी है. रोहतगी ने कोर्ट से अनुरोध किया कि वह पीड़ित बच्चों के साथ संवेदनशील व्यवहार सुनिश्चित करने के लिए जरूरी दिशानिर्देश जारी करे.

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 25 मार्च को आगे सुनवाई की बात कही. कोर्ट ने कहा कि उस दिन गुरुग्राम के पुलिस कमिश्नर और जांच अधिकारी पूरे रिकॉर्ड के साथ व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में आएं. हरियाणा सरकार महिला आईपीएस अधिकारियों की सूची दे जो जांच का जिम्मा संभालने में सक्षम हों. कोर्ट ने यह भी कहा कि माता-पिता के हलफनामे को सील बंद लिफाफे में गुरुग्राम के जिला जज को भेजा जाए. वह उस पर मजिस्ट्रेट की प्रतिक्रिया लें. अगली सुनवाई में मजिस्ट्रेट के जवाब को भी कोर्ट में रखा जाए.

 

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