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रूस के तेल निर्यात पर बैन से भारत के इस सेक्टर पर मंडराया संकट, महंगाई और लागत बढ़ने की आशंका
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रूस के तेल निर्यात पर बैन से भारत के इस सेक्टर पर मंडराया संकट, महंगाई और लागत बढ़ने की आशंका

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वैश्विक ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल के बीच एक बड़ा घटनाक्रम सामने आ रहा है, जिसने भारत की अर्थव्यवस्था और परिवहन क्षेत्र की चिंता बढ़ा दी है. ऑल इंडिया मोटर एंड गुड्स ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेंद्र कपूर ने कहा कि मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार रूस ने एक अप्रैल से 31 जुलाई, 2026 तक पेट्रोल निर्यात पर रोक लगाने का फैसला किया है. इस कदम का उद्देश्य अपने घरेलू बाजार में ईंधन की उपलब्धता और कीमतों को नियंत्रित करना बताया जा रहा है, लेकिन इसका असर वैश्विक बाजारों पर साफ दिखाई दे सकता है.

कपूर ने कहा, ‘भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85 से 90 प्रतिशत आयात करता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले किसी भी बदलाव का सीधा असर देश पर पड़ता है. रूस पिछले कुछ समय से भारत को अपेक्षाकृत सस्ता तेल उपलब्ध कराता रहा है. यदि आपूर्ति में कमी आती है या कीमतों में उछाल आता है, तो इसका प्रभाव न केवल सरकारी खर्च पर बल्कि आम लोगों की जेब पर भी पड़ेगा.’

ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर सबसे ज्यादा असर पड़ने की आशंका

देश की आर्थिक गतिविधियों की रीढ़ माने जाने वाले ट्रांसपोर्ट क्षेत्र पर इस फैसले का सबसे अधिक असर देखने को मिल सकता है. डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी से परिवहन कंपनियों की परिचालन लागत तेजी से बढ़ेगी. इससे व्यवसायियों के मुनाफे में गिरावट आएगी और माल भाड़ा दरों को बढ़ाना मजबूरी बन जाएगा. छोटे और मध्यम परिवहन संचालकों के सामने आर्थिक संकट गहरा सकता है, वहीं, सप्लाई चेन पर भी व्यापक दबाव बनने की संभावना है. परिवहन क्षेत्र में असंतुलन का सीधा असर देश की आर्थिक गति पर पड़ता है.

उद्योग, कृषि और उपभोक्ता बाजार भी होंगे प्रभावित

इस संभावित संकट का असर केवल ट्रांसपोर्ट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उद्योगों में इस्पात, सीमेंट, रसायन और प्लास्टिक जैसे सेक्टर की उत्पादन लागत बढ़ सकती है. कृषि क्षेत्र में डीजल आधारित सिंचाई और मशीनों के संचालन का खर्च बढ़ेगा. इसका सीधा असर उपभोक्ता बाजार पर पड़ेगा, जहां महंगाई बढ़ने से आम लोगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा.

लंबे समय तक स्थिति बनी रही तो गहरा सकता है संकट

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो परिवहन क्षेत्र उच्च लागत, कम आय और अधिक जोखिम के दुष्चक्र में फंस सकता है. इससे लाखों परिवहन व्यवसायियों और उनसे जुड़े रोजगार पर गंभीर असर पड़ने की आशंका है.

सरकार से तत्काल राहत और नीतिगत कदमों की मांग

परिवहन संगठनों ने केंद्र और राज्य सरकारों से इस संभावित संकट को देखते हुए कई मांगें रखी हैं. इनमें डीजल और पेट्रोल पर करों में तत्काल राहत, परिवहन क्षेत्र के लिए विशेष आर्थिक पैकेज, माल भाड़ा निर्धारण की पारदर्शी प्रणाली, वैकल्पिक ईंधनों जैसे CNG, LNG और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण को मजबूत करना शामिल है.

ऊर्जा सुरक्षा पर दीर्घकालिक सोच की जरूरत

राजेंद्र कपूर का कहना है कि वर्तमान स्थिति केवल एक अस्थायी चुनौती नहीं है, बल्कि यह भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीरता से विचार करने का संकेत भी है. ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण और वैकल्पिक ईंधनों को बढ़ावा देना अब समय की जरूरत बन चुका है. ऊर्जा संकट केवल ईंधन की उपलब्धता का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह देश की आर्थिक गति, व्यापारिक स्थिरता और परिवहन व्यवस्था की जीवनरेखा से जुड़ा विषय है. समय रहते लिए गए प्रभावी निर्णय ही देश को संभावित संकट से सुरक्षित रख सकते हैं.

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