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विधवा को मुआवजा दिलवाने के लिए SC ने किए प्रयास, 23 साल बाद रेलवे से मिलेगी भारी-भरकम रकम
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विधवा को मुआवजा दिलवाने के लिए SC ने किए प्रयास, 23 साल बाद रेलवे से मिलेगी भारी-भरकम रकम

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सुप्रीम कोर्ट ने 23 साल पुराने ट्रेन एक्सीडेंट मामले में एक महिला को मुआवजा दिलाने के लिए विशेष प्रयास किए. सायनोक्ता देवी के पति की 23 साल पहले एक ट्रेन एक्सीडेंट में मौत हो गई थी, जिसके बाद कोर्ट ने रेलवे को ब्याज के साथ चार लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया, लेकिन जब महिला से मुआवजे के लिए संपर्क करने की कोशिश की गई तो उनसे बात नहीं हो सकी. तब सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग तरीकों से महिला के नए पते का पता करवाया और अब उन्हें मुआवजा मुहैया करवाया जाएगा.

पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार साल 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे को निर्देश दिया कि वह मृतक की पत्नी को दावा याचिका दायर करने की तारीख से छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ दो महीने के अंदर चार लाख रुपये का मुआवजा दे, लेकिन दुर्भाग्यवश सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश की जानकारी महिला को नहीं मिल सकी क्योंकि उनके स्थानीय वकील का निधन हो गया था.

दूसरी ओर रेलवे ने आदेश का पालन करने का प्रयास किया और सायनोक्ता देवी को विभिन्न पत्र लिखे, लेकिन सही पता न होने के कारण उनसे कोई जवाब नहीं मिल सका. ब्याज सहित मुआवजा देने में असमर्थ रेलवे ने महिला को मुआवजा देने संबंधी 2 फरवरी, 2023 के आदेश का पालन करने में अपनी लाचारी व्यक्त की और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

इसमें कहा गया है कि पटना हाईकोर्ट को भी 21 मार्च को सूचित किया गया था कि राशि पहले ही स्वीकृत की जा चुकी है, लेकिन महिला ने मुआवजा प्राप्त करने के लिए बैंक डिटेल्स नहीं दीं. जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि महिला अपनी पारिवारिक परिस्थितियों के कारण अब कहीं और रह रही है.

महिला को मुआवजा राशि देने के लिए उसका पता लगाने के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता में पूर्वी रेलवे के प्रधान मुख्य वाणिज्यिक प्रबंधक को उस क्षेत्र में व्यापक प्रसार वाले दो प्रमुख समाचार पत्रों (अंग्रेजी और हिंदी) में एक सार्वजनिक नोटिस जारी करने का निर्देश दिया. कोर्ट ने नालंदा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और बख्तियारपुर थाने के प्रभारी को निर्देश दिया कि वे महिला के पते को सत्यापित करें और यदि वे उसका पता लगाने में सक्षम हों तो उसे उसके दावे की स्वीकृति और दी गई राशि प्राप्त करने के उसके अधिकार के बारे में सूचित करें.

बेंच ने नालंदा के एसएसपी को चार हफ्ते के भीतर इस संबंध में अनुपालन रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया. सुप्रीम कोर्ट ने बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की भी मदद ली और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव को व्यक्तिगत रूप से उस स्थान पर जाने को कहा जहां उसका अंतिम बार निवास बताया गया था. कोर्ट ने सचिव से महिला के ठिकाने के बारे में पूछताछ कर और उसकी वर्तमान स्थिति के बारे में सत्यापन कर चार सप्ताह में रिपोर्ट देने को कहा.

इस महीने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बृजेन्द्र चाहर ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि रेलवे और स्थानीय पुलिस की ओर से काफी प्रयास करने के बाद यह पाया गया कि महिला के गांव का नाम गलत दर्ज किया गया था, जिसके कारण उसे भेजे गए सभी पत्र उसे कभी प्राप्त नहीं हुए. उन्होंने कहा कि अंततः स्थानीय पुलिस सही गांव ढूंढने में सफल रही और उन्होंने महिला और उसके परिवार के सदस्यों का भी पता लगा लिया है.

कोर्ट ने इसके बाद रेलवे अधिकारियों को स्थानीय पुलिस की सहायता से महिला को मुआवजा राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया और स्थानीय थाना प्रभारी को रेलवे अधिकारियों के साथ जाकर यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि मुआवजा राशि उसके बैंक खाते में जमा हो जाए.

कोर्ट ने मामले की सुनवाई 24 नवंबर को करने का निर्देश देते हुए कहा, ‘सरपंच और ग्राम पंचायत के अन्य निर्वाचित सदस्य अपीलकर्ता (महिला) की पहचान करेंगे और इस उद्देश्य के लिए रेलवे के अधिकारी कुछ आधिकारिक दस्तावेजों की कॉपियां भी प्राप्त कर सकते हैं, जिन्हें रिकॉर्ड में दर्ज करना आवश्यक हो सकता है. इसके बाद, इस अदालत में एक अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए.’

सायनोक्ता देवी ने साल 2002 में एक रेल हादसे में अपने पति को खो दिया था. सायनोक्ता देवी ने पति की मौत का मुआवजा पाने के लिए करीब दो साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी. उनके दावे को रेलवे दावा न्यायाधिकरण और पटना हाईकोर्ट ने इस आधार पर खारिज कर दिया कि मृतक की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी.

सायनोक्ता देवी के पति विजय सिंह 21 मार्च 2002 को बख्तियारपुर स्टेशन से भागलपुर-दानापुर इंटरसिटी एक्सप्रेस से पटना जाने के लिए टिकट के साथ ट्रेन में चढ़े, लेकिन डिब्बे में इतनी ज्यादा भीड़ थी कि वह बख्तियारपुर स्टेशन पर ही चलती ट्रेन से गिर गए और उनकी मौके पर ही मौत हो गई. सायनोक्ता देवी ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और एडवोकेट फौजिया शकील के माध्यम से याचिका दायर की.

सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में रेलवे दावा न्यायाधिकरण और पटना हाईकोर्ट की इन दलीलों को खारिज कर दिया था कि मृतक की मानसिक हालत ठीक नहीं थी. कोर्ट ने निचली अदालतों के आदेश को पूरी तरह से बेतुका, काल्पनिक और रिकॉर्ड पर निर्विवाद तथ्यों के विपरीत करार देते हुए रद्द कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अपीलकर्ता के दावे को न्यायाधिकरण और हाईकोर्ट ने सिर्फ इस आधार पर स्वीकार नहीं किया कि मृतक की मानसिक हालत ठीक नहीं थी और वह एक अज्ञात ट्रेन से गिरा था. कोर्ट ने कहा कि अगर मृतक की मानसिक स्थिति ठीक नहीं होती तो उसके लिए पटना की यात्रा के लिए रेलवे टिकट खरीदना लगभग असंभव होता और वह अकेले ट्रेन में चढ़ने की कोशिश भी नहीं करता.



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