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राष्ट्रपति ने दी सुप्रीम कोर्ट के जजों को नसीहत, कहा- ‘आगे बढ़ने के लिए पीछे मुड़कर देखना भी जरूर
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राष्ट्रपति ने दी सुप्रीम कोर्ट के जजों को नसीहत, कहा- ‘आगे बढ़ने के लिए पीछे मुड़कर देखना भी जरूर

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देश की प्रथम नागरिक राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू सुप्रीम कोर्ट में हुए एक कार्यक्रम में अभिभावक की मुद्रा में नजर आईं. बुधवार (26 नवंबर, 2025) को संविधान दिवस समारोह में उन्होंने कहा कि तरक्की की दौड़ में पीछे छूट गए लोगों की तरफ जजों को विशेष ध्यान देना चाहिए. जज संविधान में दिए समानता और भाईचारा जैसे लक्ष्यों को हासिल करने के लिए काम करें.

पिता से मिली सीख को किया याद

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्य कांत, केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों की मौजूदगी में हुए कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने पिता की दी हुई एक सीख को याद किया. उन्होंने कहा, ”मेरे पिता कहते थे कि आगे बढ़ो, लेकिन आगे बढ़ने के साथ पीछे मुड़कर देखना भी जरूरी है. सिर्फ आगे बढ़ना बहादुरी नहीं. तुम्हारे पीछे चल रहे लोगों को हौसला देना, उन्हें आगे बढ़ाना असली बहादुरी है.”

संविधान के लक्ष्यों को पूरा करेंराष्ट्रपति

राष्ट्रपति ने कहा, ”24 साल बाद हम संविधान के 100 साल का उत्सव मनाएंगे. क्या हमने पीछे मुड़कर देखा कि संविधान में लिखी स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा के शब्दों को कितना साकार कर पाए? क्या अगले 24 साल में हम उसे पा सकेंगे?”

महिलाओं को दें बढ़ावा- राष्ट्रपति

संविधान सभा की कार्रवाई को याद करते हुए राष्ट्रपति ने कहा, ”संविधान सभा की बैठकों के दौरान 56 हजार लोगों ने दर्शक दीर्घा में आकर बहस को देखा और सुना. आज कितने लोग हमारे भाषण सुनते हैं?” राष्ट्रपति ने महादलित समाज से आने वाली संविधान सभा की एक सदस्या का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि संविधान ने नारी शक्ति को मजबूती दी, लेकिन हमें और आगे बढ़ना है. कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका में महिलाओं की संख्या को बढ़ाने पर ध्यान दिया जाना चाहिए. जनता की मानसिकता बदलने के लिए पहले हमें अपनी सोच बदलनी होगी.

मध्यस्थता के जरिए विवाद निपटाने पर हो दे जोर- राष्ट्रपति

अदालती कामकाज में मध्यस्थता के बढ़ते इस्तेमाल की राष्ट्रपति ने सराहना की. उन्होंने हंसते हुए कहा, ”यहां बैठे जज और वकील मुझसे नाराज होंगे कि केस कम हो गए, तो उनके पेशे का क्या होगा? लेकिन पहले भी बिना कचहरी आए समाधान होता था. तब कहां इतने मुकदमे होते थे?”

चीफ जस्टिस ने स्वीकारी जिम्मेदारी

इस मौके पर चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने संविधान सभा की 15 महिला सदस्यों में से एक बेगम एजाज रसूल को याद किया. चीफ जस्टिस ने कहा, ‘हम संविधान की राह पर चलते हुए विकसित और सशक्त हो रहे हैं. दुनिया में हमारी अर्थव्यवस्था अग्रिम पंक्ति में है, लेकिन संविधान निर्माण के 76 साल बाद भी आम नागरिक के जीवन में बुनियादी अधिकारों की सुरक्षा की चुनौती बनी हुई है. सुप्रीम कोर्ट संविधान और नागरिक अधिकारों का संरक्षक है. हम पूरी निष्ठा से इस भूमिका को निभाने का प्रयास करते रहेंगे.’

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