कोलकाता का एक बड़ा हिस्सा 16 अगस्त, 1946 को जब सांप्रदायिक उन्माद की चपेट में था, तब दक्षिण कोलकाता के एक मोहल्ले के निवासी हिंदुस्तान पार्क-पूर्णदास रोड-लेक इलाके में उपद्रवियों को शांति भंग करने से रोकने के लिए डटे रहे. लगभग आठ दशक बाद समाजसेवी संघ ने फ्लेक्स और मॉडलों के माध्यम से 1946 की अपनी उस समय की पहली दुर्गा पूजा की यादें ताजा की हैं.

सामुदायिक पूजाओं के बीच विषयों की विविधता को दर्शाते हुए बागुईआटी में अर्जुनपुर अमरा सबाई ने ‘मुखोमुखी’ (आमने-सामने) नामक एक पंडाल की स्थापना की है.

यहां प्रवेश करने वाले लोग स्टेनलेस स्टील फ्रेम लगे दर्पण में अपनी सैंकडों छवियां देख सकेंगे. चारों तरफ से शीशे की तरह चमकने वाला यह पंडाल अद्भुत कलाकृति का उदाहरण है.

समाजसेवी संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी अरिजीत मोइत्रा ने बताया कि 16 अगस्त, 1946 को शहर के कई हिस्सों में हिंसा फैली हुई थी, तब हमारा इलाका हाथ थामकर एकजुटता व सौहार्द का संदेश देने के लिए खड़ा था. समाजसेवी संघ की शुरुआत शुभचिंतकों और लीला रॉय जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की सलाह पर हुई, जो हमारी एकता से प्रभावित हुई थीं.

इस सूची में ‘अथो घाट कथा’ घाटों की अनकही कहानियां भी शामिल है. पंडाल शहर में हुगली नदी के किनारे स्थित घाटों, जिन्हें आमतौर पर गंगा घाट कहा जाता है, की तरह सजाया गया है.

यह पंडाल जटिल कलाकृतियों के माध्यम से जीवन को जीवंत करता है. इसे उत्तरी कोलकाता स्थित हाटीबागान सर्बोजनिन दुर्गा पूजा समिति ने बनाया है.

पंडालों को लेकर अरिजीत मोइत्रा ने कहा, ‘मैं यह बात साफ कर देना चाहता हूं कि हमारे विषय का इस मुद्दे पर बनी किसी भी फिल्म से कोई संबंध या संदर्भ नहीं है और यह केवल मानवीय मजबूती, सौहार्द व सद्भाव के बारे में बताने के लिए है.’

वहीं कोलकाता के उत्तर में श्यामनगर में बनर्जीपाड़ा पूजा मंदिर समिति ने नदी के प्रदूषण के मुद्दे को उजागर करने के लिए वाराणसी के घाटों को दर्शाया है.

इन घाटों को दर्शाने के लिए वाराणसी के घाट की हुबहु तस्वीर तैयार की गई है. जहां नाव से लेकर, सीढ़ियां, दुकानें और कई तरह की कलाकृति को दिखाया गया है, जो वाराणसी के दशाश्वमेध घाट की याद दिलाता है.

साथ ही इस घाट पर गणेश जी की स्थापना की गई है, जिन्हें घाट किनारे सीढ़ियों पर बैठाया गया है, जो लोगों को काफी आकर्षित कर रहा है.
Published at : 22 Sep 2025 07:11 PM (IST)


