भारत की अध्यक्षता में आयोजित पांच दिवसीय इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट शुक्रवार को सफलतापूर्वक संपन्न हो गया. इस दौरान अमेरिका, चीन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन सहित 88 देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने ‘नई दिल्ली डिक्लेरेशन ऑन एआई इम्पैक्ट’ पर हस्ताक्षर किए.
यह घोषणा पत्र एआई के भविष्य के लिए एक दिशा तय करता है और साथ ही वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती भूमिका को भी दिखाता है.
भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक सफलता
इस समझौते को भारत की बड़ी जीत माना जा रहा है. पिछले साल एआई इम्पैक्ट समिट के दौरान अमेरिका और ब्रिटेन ने यूरोप के नियमों का हवाला देते हुए घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था. लेकिन नई दिल्ली में भारत सभी देशों को एक मंच पर लाने में सफल रहा. भारत का लक्ष्य एआई का लोकतंत्रीकरण करना है, ताकि यह तकनीक कुछ बड़ी कंपनियों या सीमित लोगों तक ही सीमित न रहे.
घोषणा पत्र में किन बातों पर सहमति
घोषणा पत्र के तहत हस्ताक्षर करने वाले देशों ने कई स्वैच्छिक ढांचे और मंच बनाने पर सहमति जताई है.
डेमोक्रेटिक डिफ्यूजन चार्टर
इस पहल के तहत एआई के मूल संसाधनों तक सभी की पहुंच बढ़ाने और स्थानीय स्तर पर नए प्रयोगों को बढ़ावा देने की बात कही गई है.
ग्लोबल एआई इम्पैक्ट कॉमन्स
यह एक साझा मंच होगा, जो एआई के सफल प्रयोगों को अलग-अलग क्षेत्रों में अपनाने और दोहराने में मदद करेगा.
ट्रस्टेड एआई कॉमन्स
एआई सिस्टम की सुरक्षा और भरोसे को मजबूत करने के लिए तकनीकी साधन, मानक और अच्छी कार्य पद्धतियों का साझा भंडार बनाया जाएगा.
इंटरनेशनल नेटवर्क ऑफ एआई फॉर साइंस इंस्टीट्यूशन्स
इस पहल के तहत वैज्ञानिक शोध में एआई के उपयोग को बढ़ाने के लिए दुनिया भर के संस्थानों को जोड़ा जाएगा.
समाज और रोजगार पर भी ध्यान
घोषणा पत्र में माना गया है कि एआई समाज के सभी वर्गों को आगे बढ़ाने की क्षमता रखता है. इसके लिए ‘सोशल एम्पॉवरमेंट प्लेटफॉर्म’ बनाने की बात कही गई है. साथ ही एआई के कारण बदलते रोजगार को देखते हुए लोगों को नए कौशल सिखाने और कार्यबल को मजबूत बनाने के लिए भी स्वैच्छिक दिशा-निर्देशों पर सहमति बनी है.
लागू करना होगी सबसे बड़ी चुनौती
हालांकि 88 देशों और संगठनों ने इस घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन असली चुनौती इन वादों को जमीन पर उतारना होगी, क्योंकि सभी प्रतिबद्धताएं स्वैच्छिक हैं. सूत्रों के अनुसार, European Union ने शुरुआत में कुछ बिंदुओं पर आपत्ति जताई थी, क्योंकि वे United Nations के चार्टर जैसे लग रहे थे. लेकिन भारत को एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार मानते हुए यूरोपीय संघ अंत में इस घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार हो गया.


