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गफरूद्दीन, तगा राम भील, ब्रह्मदेव महाराज…राजस्थान के तीन लोक कलाकरों को मिला पद्म पुरस्कार
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गफरूद्दीन, तगा राम भील, ब्रह्मदेव महाराज…राजस्थान के तीन लोक कलाकरों को मिला पद्म पुरस्कार

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केंद्र सरकार ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर पद्म पुरस्कारों की घोषणा की है. इस सूची में राजस्थान से तीन नाम शामिल किए गए हैं जिसमें प्रसिद्ध भंपग वादक गफूरूद्दीन मेवाती जोगी, अलगोजा वादक तगा राम भील और ब्रह्मदेव महाराज को पद्मश्री सम्मान से नवाजा जाएगा.

स्वर्णनगरी जैसलमेर से विदेशों तक पारंपरिक अलगोजा वादक कला को पहुंचाने वाले तगाराम भील को अब पद्मश्री आवार्ड से नवाजा जाएगा. तगाराम भील जैसलमेर के एक विश्व प्रसिद्ध और पारंपरिक अलगोजा वादक हैं, जो अपनी अनूठी शैली के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने 35 से अधिक देशों में अपनी कला का प्रदर्शन किया है, जिसमें रूस, जापान, जर्मनी और फ्रांस जैसे देश शामिल हैं. तगाराम ने अपने पिता टोपणराम से यह कला सीखी और अब इसे अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिला रहे हैं. तगाराम जैसलमेर के मूलसागर गांव के निवासी हैं. 

अलगोजा और वाद्ययंत्र बजाने में महारत

उन्होंने बाल्यकाल में अपने पिता टोपणराम से अलगोजा बजाना सीखा और पारंपरिक वाद्ययंत्र में महारत हासिल की. तगाराम ने अब तक 35 से अधिक देशों में अपनी कला का प्रदर्शन किया है, जिसमें रूस, जापान, अफ्रीका, जर्मनी और फ्रांस जैसे देश शामिल हैं. वे राजस्थान के रेगिस्तानी लोक गीतों और धुनों को अलगोजे (दो बांसुरी वाला वाद्ययंत्र) के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं. कठिन परिस्थितियों के बावजूद, उन्होंने इस पारंपरिक कला को जीवित रखा है और इसे बढ़ावा देने में लगे हैं. तगाराम भील का अलगोजा वादन न केवल संगीत का अनुभव है, बल्कि यह राजस्थानी संस्कृति का एक जीवंत प्रतीक भी है. 

गफरूद्दीन मेवाती जोगी कौन हैं?

ब्रज ओर मेवाती जोगी संस्कृति के लोक संगीत और संस्कृति को देश-दुनिया तक पहुंचाने वाले प्रसिद्ध लोक कलाकार गफरूद्दीन मेवाती जोगी को केंद्र सरकार ने प्रतिष्ठित पद्म पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा की है. यह सम्मान न केवल एक कलाकार की साधना का परिणाम है, बल्कि लोक परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए उनके आजीवन योगदान की भी राष्ट्रीय स्वीकृति है.

गफरूद्दीन मेवाती जोगी राजस्थान के उन चुनिंदा लोक कलाकारों में शामिल हैं, जिन्होंने अपनी कला के माध्यम से गांव-ढाणी से लेकर बड़े मंचों तक राजस्थानी संस्कृति को जीवंत बनाए रखा. वे विशेष रूप से भपंग वाद्ययंत्र बजाने और लोकगीतों के माध्यम से कथा-वाचन के लिए जाने जाते हैं. भपंग, जो आज विलुप्त होती लोक वाद्य परंपरा में शामिल है, उसे गफरू दीन मेवाती ने अपनी पहचान और साधना का माध्यम बनाया. 

मेवाती लोक परंपराओं को जन-जन तक पहुंचाने का श्रेय

मेवाती लोक परंपराओं, ऐतिहासिक कथाओं और सामाजिक संदेशों को अपने गीतों में पिरोने की उनकी शैली अनोखी है. वे महादेव जी का ब्यावला, श्रीकृष्ण से जुड़े छंद और पद्य, तथा राजाओं की वंशावलियों को लोकगीतों के रूप में प्रस्तुत करते हैं. खास बात यह है कि उनकी गायकी में हिंदू और मुस्लिम लोक कथाएं एक साथ दिखाई देती हैं, जो समाज को हिंदू-मुस्लिम एकता और भाईचारे का मजबूत संदेश देती हैं. यही कारण है कि उनकी कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का माध्यम भी बन गई है. 

रविवार को जैसे ही केंद्र सरकार द्वारा पद्म पुरस्कार की घोषणा हुई, अलवर सहित पूरे मेवात क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई. गफरूद्दीन मेवाती जोगी के परिवार, शुभचिंतकों और साथी कलाकारों ने इस उपलब्धि को पूरे क्षेत्र का सम्मान बताया. घर पर बधाइयों का तांता लगा है, वहीं लोक कलाकारों में भी उत्साह और गर्व का माहौल है.

गफरूद्दीन मेवाती जोगी ने केंद्र सरकार का आभार जताया

इस अवसर पर गफरू दीन मेवाती ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार व्यक्त किया. उन्होंने कहा कि यह सम्मान केवल उनका नहीं, बल्कि उन सभी लोक कलाकारों का है, जो वर्षों से अपनी परंपरागत कला को जीवित रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. एक समय ऐसा भी था, जब वे मांग कर अपने परिवार का गुजारा करते थे. इसके बावजूद उन्होंने कभी अपनी कला का साथ नहीं छोड़ा. लोक संगीत और भपंग को जीवित रखने के लिए उन्होंने एक बड़ा निर्णय लिया.  गफरू दीन मेवाती की यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है. 



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