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रिचा इंडस्ट्रीज बैंक फ्रॉड केस में ED ने किया पूर्व प्रमोटर को गिरफ्तार, करोड़ों का घोटाला
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रिचा इंडस्ट्रीज बैंक फ्रॉड केस में ED ने किया पूर्व प्रमोटर को गिरफ्तार, करोड़ों का घोटाला

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रिचा इंडस्ट्रीज लिमिटेड से जुड़े बड़े बैंक फ्रॉड मामले कार्रवाई करते हुए ED की गुरुग्राम जोनल टीम ने कंपनी के पूर्व प्रमोटर और सस्पेंडेड मैनेजिंग डायरेक्टर संदीप गुप्ता को 20 जनवरी 2026 को मनी लॉन्ड्रिंग के तहत गिरफ्तार किया. गिरफ्तारी के बाद संदीप गुप्ता को गुरुग्राम की विशेष अदालत में पेश किया गया. जहां कोर्ट ने उसे 8 दिन की ED कस्टडी में भेज दिया है. ED ने ये जांच CBI की FIR के आधार पर शुरू की थी. जांच के मुताबिक साल 2015 से 2018 के बीच आरोपियों ने पब्लिक सेक्टर बैंकों को करीब 236 करोड़ का चूना लगाया.

जान बूझकर माल की फर्जी सप्लाई दिखाई

ED की जांच में सामने आया है कि रिचा इंडस्ट्रीज ने जानबूझकर बिना माल सप्लाई किए फर्जी बिक्री दिखाई. इसमें 7.42 करोड़ की कॉटन फैब्रिक सेल और 8.50 करोड़ की सोलर से जुड़ी फर्जी बिक्री शामिल है. जो कई शेल कंपनियों के नाम दिखाई गई. ये कंपनियां एंट्री ऑपरेटर्स के जरिए चलाई जा रही थी. जांच में इन लेन-देन से जुड़े इनवॉइस और अकाउंट बुक्स को फर्जी और हेराफेरी से भरा पाया गया.

इतना ही नही कंपनी ने ZLD प्लांट और मशीनरी की 9.23 करोड़ की फर्जी खरीद भी दिखाई. ये खरीद एक ऐसी कंपनी से दिखाई गई जो ना तो ऑपरेशनल थी और ना ही उसका बिजनेस प्रोफाइल, GST डिटेल या HSN कोड ऐसी मशीनरी सप्लाई से मेल खाता था. ED को ये भी पता चला कि FY 2015-16 से 2017-18 के बीच करीब 16.40 करोड़ की रकम ग्रुप कंपनियों में लोन रीपेमेंट के नाम पर घुमाई गई.

FY 2018-19 में RIL के पैसों से रिचा कृष्णा कंस्ट्रक्शंस प्राइवेट लिमिटेड में कंट्रोलिंग स्टेक खरीदी गई. जिससे रोहतक का एक अहम प्रोजेक्ट कंपनी से बाहर चला गया. इसी दौरान रिचा इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के शेयर बहुत कम कीमत पर ट्रांसफर किए गए, जिससे RIL को बड़ा नुकसान हुआ.

आरोपी ने कंपनी की कई संपत्तियों में किया हेरफेर
जांच में ये भी सामने आया है कि कॉर्पोरेट इनसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) शुरू होने से ठीक पहले संदीप गुप्ता ने कंपनी की कीमती संपत्तियों को इधर-उधर करने में बड़ी भूमिका निभाई. इसके लिए कई शेल कंपनियां बनाई गई जिनके जरिए समय-समय पर एसेट्स डायवर्ट किए गए. रिचा इंडस्ट्रीज़ का CIRP दिसंबर 2018 में शुरू हुआ था. लेकिन कोई रिजॉल्यूशन प्लान पास नहीं हो सका. इसके बाद NCLT ने 11 जून 2025 को कंपनी को लिक्विडेशन में डाल दिया. 

16 अक्टूबर 2025 को कंपनी को गोइंग कंसर्न के तौर पर बेचने के लिए ई-ऑक्शन हुआ. जिसमें 96 करोड़ के रिजर्व प्राइस पर बोली लगी. इस प्रक्रिया में IOB और यूनियन बैंक जैसे पब्लिक सेक्टर बैंकों को 696 करोड़ के दावों के बदले सिर्फ 40.29 करोड़ मिले यानी करीब 94 फीसदी का हेयरकट झेलना पड़ा.

रिचा इंडस्ट्रीज ने 6 कंपनियों को इतने करोड़ की कॉरपोरेट गारंटी दी थी
ED की जांच में ये भी खुलासा हुआ है कि अक्टूबर 2018 में CIRP शुरू होने से ठीक पहले, रिचा इंडस्ट्रीज़ ने छह कंपनियों को 232 करोड़ से ज्यादा की कॉरपोरेट गारंटी दी. ये सभी गारंटी संदीप गुप्ता ने साइन की थी. इन कंपनियों के पास कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) में करीब 48.25% वोटिंग राइट्स थे, जिससे IOB और यूनियन बैंक जैसे बड़े लेंडर्स अकेले कोई फैसला नहीं ले पाए.

जांच के मुताबिक, संदीप गुप्ता ने सारिगा कंस्ट्रक्शन प्रा. लिमिटेड नाम की एक शेल कंपनी बनाई, जिसमें RIL की पूर्व कर्मचारी नेहा सिंह को बेनामी डायरेक्टर बनाया गया. इस कंपनी के जरिए CoC में वोटिंग राइट्स हासिल कर CIRP को प्रभावित किया गया. ED का आरोप है कि CIRP के दौरान भी संदीप गुप्ता और उनके परिवार ने गैरकानूनी तरीके से कंपनी पर कंट्रोल बनाए रखा, एग्रीमेंट किए और सैलरी भी ली. इसके अलावा, CIRP शुरू होने से पहले मसूरी के एक बड़े प्रोजेक्ट को प्रमोटर से जुड़ी कंपनी को सब-कॉन्ट्रैक्ट दे दिया गया जिससे CIRP के दौरान करीब 40 करोड़ की रकम बाहर चली गई. ED का कहना है कि मामले की जांच अभी जारी है.



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