देश में पहली बार उपभोक्ता शिकायत निवारण का भारतीय राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण हुआ है. यह सर्वे इंडिया जस्टिस रिपोर्ट ने जारी किया है. सर्वे में बड़े राज्यों में आंध्र प्रदेश और छोटे राज्यों में मेघालय टॉप पर रहा है. रिपोर्ट में बताया गया है कि उपभोक्ताओं ने सबसे ज्यादा शिकायतें बीमा, आवास और बैंकिंग क्षेत्र से जुड़ी की है. राज्य आयोगों में 35% मामले तीन साल से ज्यादा से लंबित हैं. इसके अलावा 2025 में राज्य आयोगों में अध्यक्ष और सदस्यों के आधे से ज्यादा पद खाली रहे.
इस रिपोर्ट को आरटीआई से मिली जानकारी और संसद में दिए गए जवाबों के आधार पर सार्वजनिक आंकड़ो और तथ्यों के तहत जारी किया है. इसका मकसद उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के तहत वैधानिक दायित्वों को पूरा करने में उपभोक्ता कितने सक्षम हैं. इस सर्वे में बजट, बुनियादी ढांचे, मानव संसाधन, कार्यभार और लैंगिक विविधता के पैमानों से जुड़े 11 मापदंडो पर राज्य की रैंकिंग तैयार की गई है.
दो हिस्सों में बांटी गई राज्यों की रैंकिंग
राज्यों की रैंकिंग को दो हिस्सों में बांटा गया है. इनमें पहला हिस्सा उन राज्यों का है, जिनका आकार बड़ा और मिडियम है. इसके अलावा 9 छोटे राज्य हैं. इनमें पहले नंबर पर आंध्रप्रदेश है. इसके बाद सिलसिलेवार मध्यप्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, तमिलनाडु, असम, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल, बिहार, गुजरात, पंजाब, ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड और तेलंगाना है. वहीं छोटे राज्यों में पहले नंबर पर मेघालय और अन्य सिलसिलेवार राज्य सिक्किम, हिमाचल प्रदेश, गोवा, नागालैंड, मिजोरम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर शामिल है. इनके अलावा सात केंद्र शासित प्रदेशों को रैंकिंग नहीं दी गई है.
इस रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायामूर्ति संजय किशन कौल ने रिपोर्ट जारी करते हुए कहा है कि अगर कानून लागू ही न किया जाए तो संसद जिस मकसद से कानून लागू करती है, वह अधूरा रह जाता है. उन्होंने इस रिपोर्ट में जो जानकारी निकली है, उसे चिंताजनक करार दिया है. इसकी वजह से 2019 अधिनियम से उपभोक्ताओं को संरक्षण मिला है. लेकिन राज्य आयोगों में अध्यक्ष और सदस्यों के आधे से ज्यादा पद खाली हैं. सभी जिलों में आयोगों का गठन नहीं हुआ है. अदालती आदेशों के बाद भी इन पदों को नहीं भरा गया.
पिछले तीन साल से कितने केस लंबित?
रिपोर्ट में सामने आया है कि केरल में पिछले तीन साल से ज्यादा समय से करीबन 4047 केस लंबित हैं. जम्मू कश्मीर में 1190, झारखंड में 552, उत्तर प्रदेश 9122, उत्तराखंड में 521, असम में 168, मध्यप्रदेश में 2942, हरियाणा में 2427, लक्ष्यद्वीप में 1, गोवा में 46, कर्नाटक में 2852, अंडमान निकोबार में 4 केस लंबित हैं. इसके अलावा नगालैंड में 1, पुड्डुचेरी में 3, मेघालय में 1, राजस्थान में 370, हिमाचल प्रदेश में 56, सिक्किम में 2, आंध्रप्रदेश में 81 मामले लंबित हैं.
इन मापदंडों के आधार पर तैयार की गई रैंकिंग
जिन मापदंडों के आधार पर रैंकिंग तैयार की गई है. उनमें अध्यक्ष वैकेंसी, सदस्य वैकेंसी, अध्यक्ष वैकेंसी, सदस्य वैकेंसी, स्टाफ वैकेंसी, अध्यक्ष और सदस्यों में महिलाओं की संख्या, स्टाफ में महिलाओं का प्रतिशत, केस निपटान दर, तीन साल से लंबित केस, जिलों की तलुमन में जिला आयोगों का प्रतिशत, बजट उपयोग को शामिल किया गया है.
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