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तेलंगाना के सिद्दीपेट में अनोखा चुनावी नाटक, दो बार गिने वोट, फिर भी बराबर; आखिर में किस्मत ने
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तेलंगाना के सिद्दीपेट में अनोखा चुनावी नाटक, दो बार गिने वोट, फिर भी बराबर; आखिर में किस्मत ने

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तेलंगाना के सिद्दीपेट जिले के दुबाक नगर पालिका चुनाव में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जो शायद ही कभी किसी चुनाव में नजर आता हो. वार्ड नंबर 3 में भाजपा (BJP) और बीआरएस (BRS) के उम्मीदवारों के बीच हुए इस रोमांचक मुकाबले में जब वोटों की गिनती पूरी हुई, तो हर कोई हैरान रह गया. दोनों उम्मीदवारों को बराबर-बराबर वोट मिले और अंततः विजेता का फैसला करने के लिए अधिकारियों को भाग्य का सहारा लेना पड़ा.

वार्ड नंबर-3 का यह चुनाव शुरू से ही काफी चर्चित रहा था. भाजपा और बीआरएस, दोनों ही पार्टियों ने इस सीट पर जोर-शोर से प्रचार किया था और दोनों उम्मीदवारों ने कड़ी मशक्कत की थी. वोटों की गिनती शुरू होने के बाद से ही माहौल तनावपूर्ण था. पहली बार जब गिनती हुई, तो दोनों के पास समान वोट निकले. उम्मीदवारों की मांग पर अधिकारियों ने सावधानी बरतते हुए दोबारा गिनती कराई, लेकिन नतीजा वही रहा. फिर तीसरी बार भी जब वोट गिने गए, तब भी आंकड़ों में कोई बदलाव नहीं आया और दोनों उम्मीदवार बराबर की स्थिति में रहे.

कैसे हुआ उम्मीदवारों में जीत का फैसला?

चुनाव के नियमों के अनुसार, जब दो उम्मीदवारों को बराबर वोट मिलते हैं, तो विजेता का फैसला चिट्ठी डालकर किया जाता है, जिसे ‘लकी ड्रॉ’ या लॉटरी की विधि कहा जाता है. अधिकारियों ने इसी प्रक्रिया का पालन किया और दोनों उम्मीदवारों के नाम के कागजात एक बॉक्स में डालकर निकाले गए. इस ऐतिहासिक क्षण में जब बीआरएस उम्मीदवार का नाम निकला, तो उन्हें आधिकारिक तौर पर विजेता घोषित कर दिया गया. भाजपा उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा, हालांकि दोनों प्रतिद्वंद्वियों ने शांति से इस नतीजे को स्वीकार किया.

चुनावी इतिहास में पहले भी सामने आ चुकी हैं ऐसी स्थितियां

भारतीय चुनावी इतिहास में ऐसी स्थितियां कई बार पैदा हो चुकी हैं, लेकिन यह घटना इसलिए भी खास है क्योंकि तेलंगाना की नगर पालिका चुनावों में इस तरह का करीबी मुकाबला और फिर भाग्य से फैसला होना एक दुर्लभ घटना है. पिछले कुछ सालों में देश के विभिन्न हिस्सों में भी ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां लॉटरी विधि से विजेता तय किया गया.

यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का वह अनूठा पहलू है, जहां कड़ी मेहनत और प्रचार के बावजूद कभी-कभी फैसला किस्मत के हाथों में चला जाता है. दुबाक के इस चुनाव ने साबित कर दिया कि चुनावी सियासत में कभी-कभी अंतिम परिणाम कुछ ऐसा भी हो सकता है, जिसका किसी ने अनुमान न लगाया हो.



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