पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट में एक नया इतिहास बना सकती हैं. अगर अदालत ने अनुमति दी तो वह खुद अपनी याचिका पर बहस करने वाली देश की पहली मौजूदा मुख्यमंत्री होंगी. यह मामला चुनाव आयोग की तरफ से कराई जा रही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया से जुड़ा है, जो राज्य की मतदाता सूची में बदलाव से संबंधित है. इस बीच ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुकी है, जिसको देखते हुए पहले से ही सुरक्षा का भारी बंदोबस्त किया गया है.
PTI के मुताबिक ममता बनर्जी ने अपनी याचिका में मांग की है कि पश्चिम बंगाल में चल रही मतदाता सूची की यह पूरी प्रक्रिया रद्द की जाए और 2026 के विधानसभा चुनाव केवल 2025 की मौजूदा मतदाता सूची के आधार पर कराए जाएं. उनका कहना है कि SIR के नाम पर बड़ी संख्या में सही मतदाताओं के नाम हटाए जा सकते हैं, जिससे लोगों का वोट देने का अधिकार छिन सकता है.
मुख्यमंत्री ने आदेशों को रद्द करने की मांग
मुख्यमंत्री ने चुनाव आयोग के 24 जून 2025 और 27 अक्टूबर 2025 के आदेशों को रद्द करने की मांग की है. उन्होंने कहा है कि 2002 की पुरानी सूची को आधार बनाकर जांच करना और कड़े नियम लागू करना आम लोगों के लिए परेशानी पैदा कर रहा है. खासकर नाम की हल्की गलती, उम्र या माता-पिता के नाम में अंतर जैसे मामलों में लोगों को नोटिस भेजे जा रहे हैं.
मतदाता का नाम गलत तरीके से नहीं कटना चाहिए- कोर्ट
ममता बनर्जी ने अदालत से यह भी मांग की है कि ऐसे मामलों में सुनवाई रोकी जाए और चुनाव अधिकारी खुद रिकॉर्ड देखकर सुधार करें. उन्होंने कहा कि आधार कार्ड को पहचान के लिए मान्य दस्तावेज माना जाए और लोगों से बार-बार अतिरिक्त कागजात न मांगे जाएं. यह मामला तब और अहम हो गया जब हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया को लेकर आम लोगों की परेशानी पर चिंता जताई थी. अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी, सरल और मतदाता हितैषी होनी चाहिए. कोर्ट ने यह भी साफ कहा कि किसी भी योग्य मतदाता का नाम गलत तरीके से नहीं कटना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस पाने वाले मतदाताओं को मदद देने, स्थानीय स्तर पर सुनवाई करने और दस्तावेज जमा करने की प्रक्रिया आसान बनाने के निर्देश दिए थे. साथ ही राज्य प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी भी दी गई थी.
ममता बनर्जी ने की है कानून की पढ़ाई
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नाम से सुप्रीम कोर्ट में प्रवेश के लिए पास जारी कर दिया गया. यह भी संकेत मिले हैं कि वह मुख्य न्यायाधीश से खुद अदालत में बोलने की अनुमति मांग सकती हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कानून इसकी इजाजत देता है? ममता बनर्जी ने कानून की पढ़ाई की है और उनके पास LLB की डिग्री है, लेकिन सिर्फ LLB होना अदालत में वकील की तरह बहस करने के लिए काफी नहीं होता. भारत में अदालत में केस लड़ने और जज के सामने दलील देने का अधिकार Advocates Act, 1961 और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों से तय होता है.
क्या कहता है कानून?
कानून के अनुसार, कोई भी व्यक्ति तभी वकील माना जाता है जब वह राज्य बार काउंसिल में पंजीकृत हो, ऑल इंडिया बार एग्जाम (AIBE) पास किया हो और उसके पास Certificate of Practice हो. ममता बनर्जी ने इनमें से कोई भी औपचारिक प्रक्रिया पूरी नहीं की है, इसलिए कानूनी रूप से वह प्रैक्टिसिंग एडवोकेट नहीं हैं, बल्कि सिर्फ कानून स्नातक हैं. इसका साफ मतलब है कि ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट में वकील के रूप में बहस नहीं कर सकतीं. वह अदालत में याचिकाकर्ता के रूप में मौजूद रह सकती हैं, कार्यवाही देख सकती हैं और अपने वकीलों को निर्देश दे सकती हैं, लेकिन खुद जज के सामने कानूनी तर्क नहीं रख सकतीं.


