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हिमंता बिस्वा सरमा के वीडियो विवाद के बीच असम BJP का बड़ा एक्शन, आईटी सेल के एम्प्लॉई को निकाला
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हिमंता बिस्वा सरमा के वीडियो विवाद के बीच असम BJP का बड़ा एक्शन, आईटी सेल के एम्प्लॉई को निकाला

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असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के वीडियो विवाद के बीच असम बीजेपी ने बुधवार (11 फरवरी, 2026) को बड़ी कार्रवाई को अंजाम दिया है. बीजेपी ने सोशल मीडिया सेल में काम करने वाले एक कर्मचारी विकास गौरव को पार्टी से निकाल दिया है.

सीएम हिमंता बिस्वा सरमा का हाल ही में एक एआई जेनरेटेड वीडियो सामने आया था, जिसमें मुख्यमंत्री को टोपी पहने दो लोगों पर निशाना लगाते हुए दिखाया गया था. इस वीडियो के सामने आने के बाद राजनीतिक हलकों में विवाद खड़ा हो गया. कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, AIMIM समेत कई विपक्षी पार्टियां भारतीय जनता पार्टी (BJP) और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा पर सांप्रदायिक मतभेद, मुस्लिम-विरोध और नफरत फैलाने का आरोप लगाने लगे. हालांकि, विवाद बढ़ने के बाद उस वीडियो को डिलीट कर दिया गया था.

कांग्रेस ने हिमंता बिस्वा सरमा पर उठाए थे सवाल

हिमंता बिस्वा सरमा के एआई वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस ने इस घृणा से भरा और परेशान करने वाला करार दिया था. पार्टी ने कहा कि इसे एक आम ट्रोल कंटेट कहकर खारिज नहीं किया जा सकता है. यह फासीवादी चेहरे का असली प्रतिबिंब है, जिसने कई दशकों से अपने अंदर नफरत को पाला है. पिछले 11 सालों में इस नफरत को सामान्य बनाने की कोशिश की गई है. कांग्रेस पार्टी ने इस मामले में कड़ी कार्रवाई की मांग करते हुए न्यायापालिका से हस्तक्षेप करने भी मांग की.

असम के सीएम पर असदुद्दीन ओवैसी ने साधा निशाना

AIMIM प्रमुख और लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी हिमंता बिस्वा सरमा के इस वीडियो को लेकर जमकर हमला बोला. ओवैसी ने कहा कि जहां एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुनिया के दूसरे देशों में जाकर सबका साथ और सबका विकास का नारा देते हैं, वहीं दूसरी तरफ देश में उन्हीं के पार्टी के एक मुख्यमंत्री मुसलमानों को अपना निशाना बनाकर नो मर्सी (No Mercy) का नारा लगा रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट में हिमंता बिस्वा सरमा के खिलाफ PIL भी दायर

वहीं, इस मामले के तुल पकड़ने के बाद असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के खिलाफ देश के सर्वोच्च न्यायालय में 12 लोगों ने जनहित याचिका (PIL) भी दाखिल की. पीआईएल में मुख्यमंत्री पर नफरत से भरे, सांप्रदायिकता को भड़काने वाले और गैर-जिम्मेदाराना बयान देने के आरोप लगाए गए थे. याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में गंभीरता से दखल देने की मांग की.



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