असम विधानसभा चुनाव की घोषणा अगले महीने के शुरुआत में हो सकती है. विधानसभा चुनाव को लेकर असम में राजनीतिक सरगर्मी तेज हो चुकी है. असम में बीजेपी ने फिर से सत्ता में वापसी के लिए दो मोर्चों पर रणनीति तैयार की है. बूथ स्तर पर सख्त माइक्रो मैनजमेंट और कांग्रेस में सेंधमारी करके विपक्ष को कमजोर करना. विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले ही कई नेताओं के कांग्रेस से पाला बदलने को लेकर चर्चा भी तेज हो गई है.
मेरा बूथ सबसे मजबूत अभियान में जुटी बीजेपी
चुनाव से पहले बीजेपी संगठन और सामाजिक समीकरण दोनों को साधने में जुटी है. ‘मेरा बूथ सबसे मजबूत’ अभियान के जरिए हर बूथ पर कैडर सक्रिय किया जा रहा है. असम में बूथ मैनेजमेंट इसलिए अहम है क्योंकि यहां जातीय, भाषाई और धार्मिक समीकरण सीट दर सीट बदलते हैं. अभी पिछले ही हफ्ते प्रधानमंत्री ने असम के दौरे पर बूथ कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित भी किया था. जिसमें शामिल होने के लिए प्रदेश भर से बूथ के कार्यकर्ता गुवाहाटी आए थे.
कांग्रेस में टूट की अटकलें तेज
इसी के साथ कांग्रेस में टूट की अटकलें तेज हैं. तीन बार के कांग्रेस विधायक अब्दुर राशिद मंडल ने रायजोर दल का दामन थाम लिया, जहां पार्टी प्रमुख अखिल गोगोई की मौजूदगी में उन्होंने नई पारी शुरू की. चर्चा है कि शशिकांत दास भी बीजेपी का रुख कर सकते हैं. वहीं कमलाख्या डे और बसंत दास के नाम भी बीजेपी जॉइन करने की सुर्खियों में हैं.
इसके अलावा सिद्दीक अहमद के असम गण परिषद (AGP) के संपर्क में होने की खबर है. उधर, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा के इस्तीफे की अटकलों ने कांग्रेस की बेचैनी बढ़ा दी है. इसी बीच मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने दावा किया अगर बीजेपी दरवाजे खोल दे, तो कांग्रेस के सभी हिंदू नेता पार्टी छोड़ देंगे.
बीजेपी की रणनीति सिर्फ दलबदल तक सीमित नहीं
बीजेपी की रणनीति सिर्फ दलबदल तक सीमित नहीं है. असम की राजनीति में अतिक्रमण और अवैध घुसपैठ लंबे समय से बड़ा मुद्दा रहे हैं. NRC और नागरिकता से जुड़े सवालों ने राज्य की राजनीति को लगातार प्रभावित किया है. असम की राजनीति में जातीय अस्मिता, अवैध घुसपैठ, हिंदुत्व और क्षेत्रीय दलों की भूमिका—ये चारों कारक हर चुनाव में निर्णायक रहे हैं. इस बार बीजेपी बूथ मैनेजमेंट और विपक्ष में सेंध—दोनों मोर्चों पर सक्रिय है. अब देखना ये है कि क्या ‘डबल स्ट्राइक’ मिशन कांग्रेस को फिर सत्ता से दूर रखेगा, या विपक्ष बिखराव के बावजूद कोई नया सामाजिक समीकरण गढ़ पाएगा.


