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‘अरावली देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला…’, पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने दी सफाई
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‘अरावली देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला…’, पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने दी सफाई

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अरावली पहाड़ियों को लेकर इन दिनों देशभर में बवाल मचा हुआ है. इस पर्वत श्रृंखला को लेकर चल रही चर्चाओं पर अब पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव का बयान भी सामने आया है. उन्होंने इसको लेकर बनी भ्रम की स्थिति को साफ कर दिया है. प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पर्यावरण मंत्री ने अपनी बात देश के सामने रखी है. उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा है कि अरावली क्षेत्र में किसी भी तरह की कोई छूट नहीं दी जा रही है. न भविष्य में इस तरह की छूट दी जाएगी. 

‘अरावली देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला’

पर्यावरण मंत्री ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि अरावली देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला है. कुछ दिनों पहले कोर्ट का फैसला आया है. इसको लेकर कुछ लोगों ने भ्रम फैलाने की कोशिश की है, साथ ही इसको लेकर तरह-तरह के झूठ बोले हैं. कांग्रेस के वक्त भी बहुत कुछ होता रहा है. मैने निर्णय को गंभीरता से देखा है. मैं एक बात कहना चाहता हूं कि पीएम मोदी के वक्त ग्रीन अरावली को बढ़ाया गया है. उदयपुर को एक्रेडिट सिटी का दर्जा हमारे समय मिला है. 

उन्होंने कहा कि कोर्ट के फैसले में कहा गया है कि अरावली के वैज्ञानिक असेसमेंट के लिए कदम उठाने चाहिए. इसमें एनसीआर में दिल्ली, गुरुग्राम फरीदाबाद, नूंह और झज्जर शामिल हैं. माइनिंग को एनसीआर में शामिल नहीं किया गया है. 

‘कोर्ट ने किया तकनीकी कमेटी का गठन’

उन्होंने कहा कि कोर्ट ने ही अरावली हिल्स और अरावली को लेकर एक तकनीकी कमेटी का गठन किया. फैसले में जो 100 मीटर का मुद्दा है, उसे टॉप से जमीन के अंदर तक लिया गया है. अरावली रेंज यानी पर्वत श्रृंखला का 500 मीटर दायरा शामिल है. दिल्ली एनसीआर में माइनिंग की परमिशन नहीं है. कोर्ट ने कहा है कि अभी कोई नई माइनिंग की मंजूरी नहीं दी जाएगी. अरावली कोर एरिया है. 20 वाइल्डलाइफ सेंचुरी है. अरावली में 6-7% रिहायशी इलाका है. इसमें 4 टाइगर रिजर्व है और 20 फीसदी फॉरेस्ट एरिया शामिल है. फैसले में अरावली के ग्रीन प्रोजेक्ट को कोर्ट ने एप्रिशिएट किया है. 

कोर्ट के फैसले पर क्या बोले भूपेंद्र यादव?
पर्यावरण मंत्री ने अरावली पर दिए कोर्ट के फैसले का पूरा समर्थन जताया है. साथ ही कहा है कि सरकार का मकसद किसी भी तरह के विकास को रोकना नहीं है. बल्कि प्राकृतिक विरासत, पर्यावरण संतुलन और भविष्य की पीढ़ियों की सुरक्षा को सुनिश्चित करना है. केंद्रीय मंत्री ने कहा, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और वैज्ञानिक मानकों के आधार पर तय की गई यह परिभाषा अब भ्रम की सभी गुंजाइश खत्म करती है. इससे न केवल अवैध खनन पर लगाम लगेगी, बल्कि अरावली को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों पर भी सख्त रोक लगेगी.



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