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‘मुसलमानों के अधिकारों पर कुठाराघात’, वक्फ संशोधन कानून पर SC के फैसले पर बोले असदुद्दीन ओवैसी
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‘मुसलमानों के अधिकारों पर कुठाराघात’, वक्फ संशोधन कानून पर SC के फैसले पर बोले असदुद्दीन ओवैसी

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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (15 सितंबर, 2025) को वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसमें कुछ प्रावधानों पर रोक लगाई गई, लेकिन कई विवादास्पद धाराएं अभी भी बरकरार हैं. इस फैसले के तहत, वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 3D के अनुसार, पुरातत्व सर्वेक्षण ऑफ इंडिया (ASI) की ओर से संरक्षित स्मारकों को वक्फ संपत्ति नहीं माना जाएगा. यह फैसला केंद्र की भाजपा सरकार के वक्फ संशोधन अधिनियम के अनुरूप है, जो वक्फ संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाने का प्रयास करता है. कोर्ट ने इस मामले में जल्द अंतिम सुनवाई का आदेश दिया है, ताकि कार्यवाही को आगे बढ़ाया जा सके.

हैदराबाद से लोकसभा सांसद और AIMIM के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की है. उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 25 और 26 का उल्लंघन बताते हुए कहा कि यह अधिनियम मुसलमानों के धार्मिक और संपत्ति अधिकारों पर सीधा हमला है. ओवैसी ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी याचिका में तर्क दिया कि यह कानून केवल मुस्लिम वक्फ संपत्तियों को निशाना बनाता है, जबकि अन्य धार्मिक समुदायों के ट्रस्टों को ऐसी पाबंदियों का सामना नहीं करना पड़ता. उन्होंने इसे भेदभाव पूर्ण और अल्पसंख्यक विरोधी करार दिया.

ASI संरक्षित स्मारकों पर लागू नहीं होगा वक्फ का दर्जा

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ASI की ओर से संरक्षित स्मारकों पर वक्फ का दर्जा लागू नहीं होगा, लेकिन धारा 5(6) के तहत धार्मिक प्रथाओं को जारी रखने की अनुमति दी गई है. इसके साथ ही, ‘वक्फ बाय यूजर’ की अवधारणा को भविष्य के लिए समाप्त करने को प्रारंभिक रूप से उचित ठहराया गया, जिसे सरकार ने सरकारी संपत्तियों पर अतिक्रमण रोकने का आधार बताया.

ओवैसी ने इस प्रावधान का विरोध करते हुए कहा कि यह पुरानी मस्जिदों और दरगाहों जैसे धार्मिक स्थलों को खतरे में डालता है. उन्होंने सवाल उठाया कि अगर कोई व्यक्ति इस्लाम अपनाता है, तो उसके धार्मिक अधिकारों पर पांच साल की शर्त क्यों थोपी जा रही है? कोर्ट ने इस शर्त पर स्टे लगा दिया है, लेकिन ओवैसी के अनुसार, यह भेदभाव का स्पष्ट उदाहरण है.

वक्फ संपत्तियों के सर्वे में कलेक्टर के हस्तक्षेप पर ओवैसी ने जताई चिंता

कोर्ट ने कलेक्टर की ओर से वक्फ संपत्तियों के सर्वे पर रोक नहीं लगाई, जो पहले सर्वे कमिश्नर के पास था. यह प्रावधान सरकारी हस्तक्षेप को बढ़ाता है. ओवैसी ने इस पर चिंता जताते हुए कहा कि कलेक्टर की भूमिका वक्फ बोर्ड की स्वायत्तता को कमजोर करती है. इसके अलावा, वक्फ बोर्डों में गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति को कोर्ट ने स्टे नहीं किया, जिसे ओवैसी ने अनुच्छेद 26 का उल्लंघन बताया, क्योंकि यह मुसलमानों के धार्मिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप को बढ़ावा देता है. वक्फ पंजीकरण की अनिवार्यता को भी बरकरार रखा गया, जो पुरानी वक्फ संपत्तियों को खतरे में डाल सकता है.

ओवैसी ने वक्फ बोर्डों के प्रबंधन को लेकर उठाए गंभीर सवाल

वक्फ बोर्डों के प्रबंधन को लेकर ओवैसी ने कई गंभीर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि केवल सात राज्यों में ही वक्फ सर्वे पूरा हुआ है और भाजपा सरकार वक्फ की आय बढ़ाने के बजाय उसकी संपत्तियों को कमजोर करने की कोशिश कर रही है.

कानून में अतिक्रमणकारियों पर त्वरित कार्रवाई के प्रावधान कमजोर हैं और वक्फ चुनावों को स्थगित कर मुतवल्ली की नियुक्ति विधायकों या सांसदों के जरिए करने का प्रस्ताव भाजपा के राजनीतिक दबदबे को बढ़ाता है. ओवैसी ने इसे वक्फ बोर्डों की स्वायत्तता पर हमला बताया.

ओवैसी ने बाबरी मस्जिद का दिया उदाहरण

ओवैसी ने बाबरी मस्जिद का उदाहरण देते हुए कहा कि यह खुद एक वक्फ संपत्ति है और यह फैसला ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों को प्रभावित कर सकता है. उन्होंने चेतावनी दी कि यह अधिनियम मुसलमानों के धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करने का प्रयास है. उन्होंने संसद में वक्फ संशोधन बिल को फाड़कर अपना विरोध दर्ज किया था और कहा कि यह मुसलमानों की आस्था पर हमला है.

ओवैसी ने जोर देकर कहा कि वक्फ संपत्तियां न केवल मुसलमानों की हैं, बल्कि सामाजिक कल्याण के लिए हैं, जो सभी समुदायों को लाभ पहुंचाती हैं. अनुच्छेद 26 के तहत, वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिमों की नियुक्ति अल्पसंख्यक अधिकारों का हनन है.

ओवैसी ने सुप्रीम कोर्ट से की संवैधानिक न्याय की मांग

उन्होंने इस फैसले को मुस्लिम समुदाय के खिलाफ भेदभावपूर्ण बताते हुए सुप्रीम कोर्ट से संवैधानिक न्याय की मांग की है. ओवैसी ने कहा, ‘यह अधिनियम संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ है. हम इसके खिलाफ कानूनी और लोकतांत्रिक लड़ाई जारी रखेंगे.’

इस फैसले ने वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और अल्पसंख्यक अधिकारों पर नई बहस छेड़ दी है. ओवैसी ने देशवासियों से एकजुट होकर इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का आह्वान किया है, ताकि संविधान की रक्षा की जा सके. क्या यह फैसला सभी के लिए न्यायसंगत है? यह सवाल अनुत्तरित है, लेकिन ओवैसी का संकल्प है कि मुसलमानों के हक के लिए संघर्ष जारी रहेगा.

यह भी पढ़ेंः श्रीनगर में ED की 32वीं त्रैमासिक कॉन्फ्रेंस संपन्न, मनी लॉन्ड्रिंग केसों को तेजी से निपटाने पर जोर



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