Ideas of India Summit 2026: ABP Network के खास कार्यक्रम Ideas of India Summit 2026 में अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार जॉन मियरशाइमर (John Mearsheimer) ने इस बार भारत और अमेरिका के रिश्तों पर खुलकर बात हुई. अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार ने कहा कि अमेरिका भारत को चीन के सामने एक मजबूत साथी मानता है, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि आर्थिक दबाव और राष्ट्रपति ट्रंप की बदलती कार्यशैली की वजह से दोनों देशों के रिश्तों में असहजता बढ़ी है.
उन्होंने कहा कि दुनिया तेजी से बदल रही है. भारत इस बदलती दुनिया में अपनी जगह मजबूत करना चाहता है. ऐसे समय में अमेरिका के साथ उसका रिश्ता अहम भी है और थोड़ा जटिल भी. इस सेशन का शशि थरूर ने किया.
‘ट्रंप शुल्क के बादशाह हैं’
मियरशाइमर ने साफ कहा कि व्यापार नीति कोई छोटा मुद्दा नहीं है, बल्कि यही तनाव की बड़ी वजह है. उन्होंने कहा, “राष्ट्रपति ट्रंप शुल्क के बादशाह हैं. उनका स्वभाव काफी बदलता रहता है. ऐसी स्थिति में भारत के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह अमेरिका के बहुत ज्यादा करीब न जाए. अगर आप आर्थिक रूप से अमेरिका पर निर्भर हो जाते हैं, तो वह उस स्थिति का इस्तेमाल अपने हिसाब से फैसले करवाने में कर सकता है.”
उनके मुताबिक शुल्क केवल आर्थिक हथियार नहीं हैं, बल्कि दबाव बनाने का जरिया भी हैं. उन्होंने कहा कि ट्रंप अपने सहयोगी देशों पर भी व्यापार का दबाव बनाने से नहीं हिचकते. यही वजह है कि आज अमेरिका और भारत के रिश्ते में खटास दिख रही है.
उन्होंने यह भी कहा, “ट्रंप अपने विरोधियों से ज्यादा सख्ती कभी-कभी अपने सहयोगियों के साथ दिखाते हैं. यूरोपीय देशों के साथ उनका व्यवहार इसका उदाहरण है. उनके पास एकतरफा फैसले लागू करने के कई साधन हैं.” इस नजरिए में भारत को अमेरिका के साथ नजदीकी बढ़ाने के फायदे और आर्थिक जोखिम, दोनों को ध्यान में रखना होगा.
चीन को लेकर अमेरिका की रणनीति में भारत की भूमिका
तनाव के बावजूद मियरशाइमर ने कहा कि अमेरिकी रणनीति में भारत की भूमिका बेहद अहम है. उन्होंने कहा, “ज्यादातर अमेरिकी नीति निर्माता मानते हैं कि भारत एक उभरती हुई बड़ी शक्ति है और आने वाले समय में दुनिया की प्रमुख ताकतों में शामिल होगा.” उन्होंने साफ शब्दों में कहा, “अमेरिका समझता है कि चीन को संतुलित करने की कोशिश में भारत एक अहम खिलाड़ी है. अमेरिका चीन को रोकने के लिए प्रतिबद्ध है. अमेरिका खुद एक क्षेत्रीय ताकत है और अपनी स्थिति बनाए रखना चाहता है.”
उनके मुताबिक अमेरिका-चीन की प्रतिस्पर्धा गहरी और लंबे समय तक चलने वाली है. उन्होंने कहा, “चीन अमेरिका जितना ताकतवर बनना चाहता है. लेकिन अमेरिका एशिया में चीन का दबदबा स्वीकार नहीं करेगा. ऐसे में प्रतिस्पर्धा और टकराव लगभग तय है.” इस नजरिए से भारत अमेरिका के लिए एक स्वाभाविक साझेदार और रणनीतिक सहयोगी बन जाता है.
नई दिल्ली के सामने संतुलन की चुनौती
मियरशाइमर ने चेतावनी दी कि भारत को बहुत सावधानी से कदम उठाने होंगे. उन्होंने कहा, “भारत को आर्थिक और सैन्य रूप से अमेरिका पर ज्यादा निर्भर होने से बचना चाहिए.” उन्होंने माना कि चीन को लेकर चिंता की वजह से भारत के पास अमेरिका के साथ नजदीकी बढ़ाने के मजबूत कारण हैं. लेकिन हाल की घटनाओं ने स्थिति को जटिल बना दिया है.
उन्होंने कहा, “पिछले साल तक भारत को लगता था कि अमेरिका के साथ उसके रिश्ते मजबूत और सकारात्मक रहेंगे. लेकिन ट्रंप के कुछ बयानों से भारतीय लोगों में नाराजगी हुई और हालात बदल गए.” साथ ही उन्होंने कहा कि पिछले एक साल की घटनाओं ने यह भी दिखाया है कि अमेरिका के बहुत करीब जाने से भी जोखिम हैं. उन्होंने कहा, “मेरा सुझाव है कि भारत को एक संतुलित रास्ता अपनाना चाहिए.”
क्या अमेरिका का कम ध्यान भारत के लिए फायदेमंद?
चर्चा के अंत में मियरशाइमर ने एक दिलचस्प बात कही. उन्होंने कहा, “ट्रंप इस समय पश्चिमी गोलार्ध में ज्यादा ध्यान दे रहे हैं इसलिए अमेरिका आजकल भारत पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दे रहा. हमारे पास भारत पर ज्यादा समय नहीं है और यह भारत के हित में हो सकता है क्योंकि आप नहीं चाहेंगे कि अमेरिका आप पर बहुत ज्यादा ध्यान दे.”
उनके इस बयान ने रिश्तों की एक नई परत सामने रखी. एक तरफ अमेरिका भारत को चीन के संतुलन में अहम मानता है, दूसरी तरफ ज्यादा अमेरिकी दबाव भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है.
आइडियाज ऑफ इंडिया 2026 में मियरशाइमर की यह टिप्पणी बहस को नया आयाम देती है. सवाल यह नहीं है कि भारत और अमेरिका के हित चीन को लेकर मिलते हैं या नहीं. असली सवाल यह है कि क्या ये साझा हित आर्थिक दबाव, बदलते नेतृत्व और अलग-अलग राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के बीच टिक पाएंगे या नहीं.


