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CPI का 100 साल का सफर! स्थापना से लेकर सत्ता और आज की सियासी हकीकत, जानें सबकुछ
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CPI का 100 साल का सफर! स्थापना से लेकर सत्ता और आज की सियासी हकीकत, जानें सबकुछ

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भारतीय राजनीति में अगर किसी पार्टी ने मजदूर, किसान और वंचित वर्ग की आवाज सबसे पहले संगठित रूप में उठाई तो वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानी CPI रही है. यह पार्टी सिर्फ एक राजनीतिक संगठन नहीं थी, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन के रूप में उभरी, जिसने आजादी से पहले और बाद में देश की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया. हालांकि आज CPI की राजनीतिक ताकत सीमित दिखती है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब यह कांग्रेस के बाद देश की सबसे बड़ी पार्टी हुआ करती थी.

CPI की स्थापना की तारीख आज भी बहस का विषय बनी हुई है. पार्टी के भीतर और वामपंथी धड़े में इसे लेकर दो अलग-अलग धारणाएं मौजूद हैं. CPI का आधिकारिक दावा है कि पार्टी का गठन 26 दिसंबर 1925 को कानपुर में हुआ था. इसी दिन आयोजित स्थापना सम्मेलन में पूरे देश से प्रतिनिधि पहुंचे थे और पार्टी को एक संगठित राजनीतिक ढांचा मिला. वहीं CPI(M) यानी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का मानना है कि CPI की असली नींव 17 अक्टूबर 1920 को ताशकंद में पड़ी थी, जब पहली बार भारतीय कम्युनिस्टों ने संगठित गतिविधियां शुरू कीं. यही वैचारिक असहमति आगे चलकर 1964 के ऐतिहासिक विभाजन की वजह बनी.

1925 का कानपुर सम्मेलन और पार्टी की सोच

कानपुर में हुए स्थापना सम्मेलन में CPI ने अपने लक्ष्य बिल्कुल साफ शब्दों में रखे थे. पार्टी का मानना था कि भारत को ब्रिटिश शासन से आजाद कराने के लिए सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता काफी नहीं है, बल्कि आर्थिक और सामाजिक बदलाव भी जरूरी है. CPI उत्पादन के साधनों को समाज के नियंत्रण में लाने और मजदूर-किसान आधारित गणराज्य की स्थापना की बात कर रही थी. उस दौर में यह विचार ब्रिटिश हुकूमत के लिए सबसे बड़ा खतरा थे.

सांप्रदायिक राजनीति से सख्त दूरी

CPI की विचारधारा शुरू से ही धर्म आधारित राजनीति के खिलाफ रही है. पार्टी ने स्पष्ट कर दिया था कि जो व्यक्ति किसी भी सांप्रदायिक संगठन से जुड़ा है, वह CPI का सदस्य नहीं बन सकता. ब्रिटिश सरकार ने CPI को शुरू से ही संदेह की नजर से देखा. 1934 में पार्टी पर पहला बड़ा प्रतिबंध लगाया गया, जो 1942 तक चला. इस दौरान पार्टी को भूमिगत होकर काम करना पड़ा. आजादी से ठीक पहले के वर्षों में भी CPI पर लगातार दबाव बना रहा. इसी दौर में पी.सी. जोशी पार्टी के महासचिव बने, जिन्होंने संगठन को दोबारा खड़ा किया और स्वतंत्र भारत में CPI को मजबूत राजनीतिक विकल्प के रूप में पेश किया.

आज़ादी के बाद CPI का स्वर्णिम दौर

1952 के पहले आम चुनाव में CPI ने चौंकाने वाला प्रदर्शन किया. पार्टी लोकसभा में कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी और 16 सांसद संसद पहुंचे. इस दौर में CPI ने मजदूर आंदोलनों, किसान संघर्षों और ट्रेड यूनियनों के जरिए अपनी मजबूत जमीनी पकड़ बनाई.

1964 का विभाजन और वाम राजनीति का मोड़

1964 में वैचारिक मतभेद इतने गहरे हो गए कि CPI दो हिस्सों में बंट गई. एक ओर CPI रही, दूसरी ओर CPI(M) का गठन हुआ. धीरे-धीरे CPI(M) ज्यादा आक्रामक और संगठित वाम ताकत के रूप में उभरी, जबकि CPI अपेक्षाकृत नरम और सहयोगी राजनीति की ओर बढ़ती चली गई.

कांग्रेस के साथ संघर्ष भी, सहयोग भी

CPI की राजनीति समय के साथ बदलती रही. कभी उसने इंदिरा गांधी सरकार का समर्थन किया तो कभी वाम एकता पर जोर दिया. 1996 से 1998 के बीच CPI ने संयुक्त मोर्चा सरकारों में अहम भूमिका निभाई. 2004 से 2008 तक पार्टी ने UPA-1 सरकार को बाहर से समर्थन दिया, लेकिन परमाणु समझौते के मुद्दे पर समर्थन वापस ले लिया.

आज की CPI सीमित ताकत, लेकिन जमीनी मौजूदगी

वर्तमान समय में CPI की संसदीय ताकत सीमित जरूर है, लेकिन पार्टी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. लोकसभा में इसके दो सांसद हैं और राज्यसभा में भी पार्टी की मौजूदगी बनी हुई है. केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में CPI आज भी सत्ताधारी गठबंधनों का हिस्सा है. इन राज्यों में पार्टी की संगठनात्मक पकड़ बाकी देश की तुलना में कहीं ज्यादा मजबूत मानी जाती है.

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