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कौन था वो नेता, जिसे धर्मेंद्र ने इतने वोटों से हराया था चुनाव, फिर क्यों कर ली राजनीति से तौबा
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कौन था वो नेता, जिसे धर्मेंद्र ने इतने वोटों से हराया था चुनाव, फिर क्यों कर ली राजनीति से तौबा

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हिंदी सिनेमा में ‘ही-मैन’ के नाम से मशहूर दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र ने न सिर्फ फिल्मों में बल्कि राजनीति में भी अपना भाग्य आजमाया था. 2004 में मिली ऐतिहासिक चुनावी जीत के बाद हर किसी को लगा था कि स्क्रीन के सुपरस्टार राजनीति में भी सुपरहिट साबित होंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सीट जीती, लेकिन सियासत दिल जीत नहीं सकी  और यही वजह थी कि धर्मेंद्र ने राजनीति से हमेशा के लिए दूरी बना ली.

किस नेता को हराया था धर्मेंद्र ने?
2004 के लोकसभा चुनाव में धर्मेंद्र ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थामा था. उन्हें राजस्थान की बीकानेर लोकसभा सीट से टिकट मिला और उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार रमेश्वर लाल डूडी को 60 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से करारी मात दी. जीत के बाद धर्मेंद्र संसद पहुंचे और लोकसभा सांसद बन गए.

फिर क्यों छोड़ दी राजनीति?
चुनाव जीतने के बाद भी धर्मेंद्र का सियासी सफर उम्मीदों जैसा नहीं रहा. विरोधी दल और स्थानीय लोग अक्सर यह आरोप लगाते रहे कि धर्मेंद्र अपने क्षेत्र में कम और मुंबई में ज्यादा रहते हैं. कहा गया कि वे ज्यादातर समय फिल्म शूटिंग या फार्महाउस में बिताते हैं और जनता के बीच कम दिखाई देते हैं. कठिन राजनीतिक माहौल और आलोचनाओं के बीच धर्मेंद्र ने जैसे-तैसे अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया, लेकिन दोबारा चुनाव मैदान में उतरने का फैसला नहीं लिया.

धर्मेंद्र ने कहा था- ‘यह जगह मेरे लिए ठीक नहीं थी’
बाद में एक इंटरव्यू में धर्मेंद्र ने राजनीति से दूरी बनाने की वजह बताते हुए कहा था – ‘ये जगह मेरे लिए ठीक नहीं थी.’ उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उन्हें राजनीति पसंद नहीं आई और चुनाव लड़ने पर पछतावा भी हुआ था.

फिल्मी करियर के बाद राजनीति भी, लेकिन सफर छोटा रहा
89 वर्षीय धर्मेंद्र ने अपने फिल्मी करियर में अपार सफलता हासिल की, 300 से ज्यादा फिल्मों में काम किया और अनगिनत पुरस्कार अपने नाम किए, लेकिन राजनीति उन्हें रास नहीं आई और इसलिए उन्होंने कभी दोबारा चुनाव नहीं लड़ा.  8 दिसंबर 1935 को पंजाब के एक छोटे से गांव नसराली में जन्मे धर्म सिंह देओल का जीवन बेहद सरल था. उनके पिता केवल कृष्ण देओल एक स्कूल प्रिंसिपल थे और मां का नाम सतवंत कौर था.

माता-पिता की परवरिश ने उन्हें मिट्टी से जोड़े रखा, लेकिन सिनेमा का जादू उन्हें मुंबई खींच लाया. शुरुआती दिनों में उन्होंने काफी संघर्ष किया, वह गैरेज के बाहर सोए, यहां तक कि उन्होंने 200 रुपए सैलरी वाली नौकरी भी की. इस दौरान 1960 में उन्हें ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ फिल्म का ऑफर मिला, जिससे उन्होंने बॉलीवुड में डेब्यू किया.



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