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Explained: तेंदुए के डर से कीलों का पट्टा पहन रहे लोग, चीतों ने भुला दिया वाइलडलाइफ मैनेजमेंट?
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Explained: तेंदुए के डर से कीलों का पट्टा पहन रहे लोग, चीतों ने भुला दिया वाइलडलाइफ मैनेजमेंट?

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सवाल 1- कूनो नेशनल पार्क में 5 चीता शावकों के जन्म की खबर क्या है?
जवाब- मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में भारतीय मूल की मादा चीता ‘मुखी’ ने पांच स्वस्थ शावकों को जन्म दिया है. मुखी नामीबिया से लाई गई चीता ‘सियाया’ की बेटी है, जो भारत में पैदा हुए 4 शावकों में अकेली जिंदा बची है. यह उपलब्धि भारत के ‘चीता पुनः परिचय कार्यक्रम’ के लिए एक ऐतिहासिक सफलता मानी जा रही है. मां और शावक पूरी तरह स्वस्थ हैं.

यह पहली बार है जब भारत में जन्मी किसी मादा चीता ने देश की धरती पर सफल प्रजनन किया है. लगभग 33 महीने की मुखी अब ‘प्रोजेक्ट चीता’ की पहली ऐसी मादा बन गई है, जिसने पांच शावकों को जन्म देकर संरक्षण प्रयासों की सफलता को मजबूती दी है.

कूनो नेशनल पार्क के अधिकारियों के मुताबिक, यह तीसरी पीढ़ी के शावक भारत की धरती पर पैदा हुए हैं, जो इन्हें भारतीय वातावरण के साथ बेहतर तालमेल बिठाने में मदद करेगी, क्योंकि वह जन्म के साथ यहां के मौसम से अनुकूलन कर रही है। इनका प्राकृतिक रूप से यहाँ जन्म लेना, चीता प्रोजेक्ट की बढ़ी सफलता है।

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह सफल प्रजनन संकेत है कि चीते भारतीय आवासों में तेजी से अनुकूल हो रहे हैं. उनका स्वास्थ्य और व्यवहार प्राकृतिक परिस्थितियों में संतोषजनक पाया गया है. इससे देश के दीर्घकालिक संरक्षण लक्ष्यों को बल मिलेगा और वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में भारत की वैश्विक छवि मजबूत होगी.

सवाल 2- दूसरी तरफ महाराष्ट्र में तेंदुए ने लोगों के गले में दहशत का पट्टा कैसे डाल दिया है?
जवाब- बीते 40 दिनों में महाराष्ट्र में तेंदुए ने 3 बड़े हमले किए…

  • 12 अक्टूबर 2025: शिरूर में 5 साल की शिवन्या शैलेश पर तेंदुए ने हमला किया और उसकी मौत हो गई. यह हमला दिन में हुआ, जब बच्ची बाहर खेल रही थी.
  • 22 अक्टूबर 2025: शिरूर में 82 साल की बुजुर्ग महिला भगुबाई रंगनाथ जाधव पर तेंदुए ने हमला किया और उनकी मौत हो गई. यह हमला भी दिन में घर के पास हुआ.
  • 2 नवंबर 2025: शिरूर के पिंपरखेड़ गांव में 13 साल का रोहन विलास बोम्बे पर तेंदुए ने हमला कर के मार डाला.

तीसरे हमले के बाद लोगों का गुस्सा फूट पड़ा और पुणे-नासिक हाईवे पर 18 घंटे जाम कर दिया गया. विरोध प्रदर्शन बढे़ और तेंदुए को मारने की मांग की गई.

4 नवंबर 2025 की रात करीब 10:30 बजे वन विभाग की टीम पिंपरखेड़ा के पास ऑपरेशन चलाकर तेदुंए का एनकाउंटर कर दिया. शव गांव वालों को दिखाया गया और माणिकडोह रेस्क्यू सेंटर में पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया.

इसके अलावा नवंबर में ही एक और नर तेंदुआ पिंजरे में फंस गया था और उसे रिलोकेट किया. लेकिन यहां तेंदुए का आतंक रुकता नहीं है. क्योंकि यह एक या दो तेंदुए की बात नहीं है. यहां कई सारे तेंदुए गावों में शिकार कर रहे हैं.पिंपरखेड़ा में डर का माहौल इतना ज्यादा है कि लोग गले में कीलों वाला लोहे का पट्टा पहनने लगे हैं. दरअसल, तेंदुए गर्दन पर हमला करते हैं, इसलिए खेती के लिए खेतों में जाने को मजबूर ग्रामीणों का यह कदम उनके गहरे डर को दिखाता है.

महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार ने तेंदुए के हमले को ‘राज्य आपदा’ घोषित करने पर विचार कर रही है. यानी इसके बाद तेंदुए की नसबंदी अभियान चलाया जाएगा और रेस्क्यू सेंटर स्थापित होंगे. संवेदनशील इलाकों में गश्त बढ़ेगी और ड्रोन से निगरानी होगी.

सवाल 3- उत्तराखंड के 500 गांव गुलदार-बाघ की दहशत में क्यों हैं?
जवाब- उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में वन्य जीव और इंसानों के बीच संघर्ष बढ़ता जा रहा है. अब 500 से ज्यादा गांव डर में जी रहे हैं. जंगलों के किनारे बसे गांव में गुलदार, बाघ, भालू और हाथी समेत अन्य जंगली जानवरों का आना-जाना लगा रहता और रोज हमले का डर बना रहता है. खेत खलिहान रास्ते और यहां तक की घरों की दहलीज भी अब सुरक्षित नहीं रह गई है.

19 नवंबर को उत्तराखंड के पौड़ी जिले के कोटी गांव में घास काटने गई 65 साल की गिन्नी देवी पर गुलदार ने हमला कर उसे मौत के घाट उतार दिया. वह शाम 4 बजे अपने घर से महज 300 मीटर दूर घास काटने गईं थीं. इस घटना से पूरे इलाके में दहशत फैल गई. प्रशासन ने पिंजरा लगाकर गुलदार की तलाश तेज कर दी है.

बात सिर्फ गुलदार तक सीमित नहीं है. गढ़वाल रीजन में इस समय भालुओं ने आतंक मचाया हुआ है. 17 नवंबर को पौड़ी गढ़वाल के बीरोंखाल ब्लॉक में एक भालू ने 40 साल की लक्ष्मी देवी पर हमला कर गंभीर रूप से घायल कर दिया. लक्ष्मी देवी 3-4 महिलाओं के साथ घास काटने गईं थीं. लक्ष्मी का चेहरा खून से लथपथ हो गया था.

13 नवंबर को चौबट्टाखाल क्षेत्र में बाघ ने बगड़ीगाड निवासी रानी देवी पर हमला कर के मार दिया. अगले दिन घंडियाल गांव की प्रभा देवी पर हमला कर के घायल कर दिया. इसके बाद प्रशासन ने आदमखोर बाघ को मारने के निर्देश जारी किए. बाघ के लिए शूटर्स तैनात किए गए हैं.

वन विभाग का कहना है कि इन संवेदनशील गांव में सबसे ज्यादा खतरा गुलदार और बाघ से है. दिन में खेतों में काम करना और शाम होते घरों से बाहर निकलना जोखिम भरा हो सकता है. इसके अलावा हाथी भी सड़कों पर गाड़ियों में तोड़फोड़ कर रहे हैं.

सवाल 4- रहवासी इलाकों में जंगली जानवरों का आतंक क्यों बढ़ रहा है?
जवाब- भारत में पिछले 5-10 सालों में गुलदार (तेंदुआ), बाघ, हाथी और भालू जैसे जानवर रहवासी इलाकों में घुसने और हमले करने लगे हैं. महाराष्ट्र, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और कर्नाटक जैसे राज्यों में यह रोज की समस्या बन गई है. यह सिर्फ जानवरों के ज्यादा होने की वजह से नहीं, बल्कि इंसानों और जंगल के बीच के टकराव की वजह से हो रहा है…

1. जंगलों का तेजी से सिकुड़ना और टुकड़े-टुकड़े होना

  • भारत में हर साल हजारों हेक्टेयर जंगल कट रहे हैं, जहां सड़कें, रेल, डैम, माइनिंग, खेती और शहरों को बनाया जा रहा है.
  • जानवरों के लिए जंगलों में ही ‘कॉरिडोर’ बनाए जा रहे हैं, यानी जानवरों के जाने के रास्ते. इससे जानवर भटककर गांवों-शहरों में पहुंच जाते हैं.
  • उत्तराखंड में चारधाम ऑल वेदर रोड और रेल प्रोजेक्ट से जंगल कटे, जिससे हाथी-गुलदार बाहर निकलकर रहवासी इलाकों में घुसे थे.

2. गन्ने के घने खेत जानवरों के लिए ‘परफेक्ट हाइडआउट’

  • उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड (तराई), महाराष्ट्र और कर्नाटक में गन्ने के ऊंचे-घने खेत तेंदुओं के लिए छिपने की सबसे अच्छी जगह हैं.
  • गन्ने में पानी, छांव और शिकार (कुत्ता, बकरियां) आसानी से मिल जाता है.
  • कटाई के समय अक्टूबर से मार्च के महीनों में तेंदुए बाहर निकलते हैं और हमले करते हैं.
  • महाराष्ट्र के जुन्नार-शिरूर में तेंदुए के हमलों की यही सबसे बड़ी वजह है.

3. इंसानी बस्तियां जंगल के अंदर तक फैल गईं

  • गांव जंगल की किनारे पर बस गए और खेती जंगल तक पहुंच गई.
  • लोग जंगल में लकड़ी, घास, शराब बनाने की पत्तियां लेने जाते हैं, जिससे सीधा टकराव होता है.
  • उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्यों में पलायन से गांव खाली पड़े हैं. गुलदार इन घरों में आकर छिप जाते हैं.

4. शिकार की कमी और आसान शिकार

  • जंगल में हिरण और सांभर जैसे प्राकृतिक शिकार कम हो गए हैं. वहीं, गांवों  में कुत्ते, बकरियां, गाय-भैंस आसानी से मिल जाते हैं.
  • एक बार इंसान पर हमला सफल हो जाए तो जानवर ‘मैन ईटर’” बन जाता है और बार-बार शिकार आता है.

इसके अलावा जानवरों के संरक्षण से उनकी संख्या बढ़ी है. जंगलों के कटने वह छोटे होते जा रहे हैं, जिससे जानवरों के लिए जगह का दायरा सिमट रहा है. इस वजह से जंगली जानवर रहवासी इलाकों की तरफ बढ़ जाते हैं. जंगलों में यह जानवर सिर्फ छोटे जानवरों का शिकार कर के पेट भरते थे, लेकिन गांव में आने के बाद इनके मुंह इंसान का खून लग जाता है. फिर यही सिलसिला चलता रहता है.

सवाल 5- तो क्या चीतों की खुशी में शासन-प्रशासन के हाथों से वाइल्डलाइफ मैनेजमेंट निकला रहा है?
जवाब- एक्सपर्ट्स कहते हैं, ‘चीतों की खुशी में वाइल्डलाइफ मैनेजमेंट शासन-प्रशासन के हाथों से पूरी तरह निकल नहीं रहा है, लेकिन यह साफ दिख रहा है कि सरकार और वन विभाग की सारी ऊर्जा, बजट और मीडिया अटेंशन प्रोजेक्ट चीता को मिल रही है. जबकि रोजमर्रा के मानव-वन्यजीव संघर्ष को मैनेज करने में उतनी ही तेजी और संसाधन नहीं दिख रहे. यह एक तरह का प्रायोरिटी इंबेलेंस है, न कि पूरी तरह से कंट्रोल खो जाना.’

वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) की 2023-2024 रिपोर्ट कहती है कि भारत में हर साल मानव-वन्यजीव संघर्ष से औसतन 500 से ज्यादा लोग मारे जाते हैं और यह संख्या बढ़ रही है. लेकिन इसके लिए कोई अलग ‘प्रोजेक्ट लेपर्ड’ या ‘प्रोजेक्ट ह्यूमन-वाइल्डलाइफ कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट’ नहीं है जो उतने ही संसाधनों और राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ चल रहा हो. प्रोजेक्ट चीता के लिए केंद्र ने अलग से करोड़ों करोड़ रुपए दिए, जबकि तेंदुए मैनेजमेंट के लिए महाराष्ट्र सरकार को अभी-अभी 11.25 करोड़ रुपए और 1000 अतिरिक्त पिंजरे देने का फैसला किया है, जो बहुत कम है.

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह अंतर इसलिए भी दिखता है क्योंकि चीता प्रोजेक्ट ‘ग्लैमरस’ है. यह भारत को दुनिया में ‘चीता फिर से लाने वाला पहला देश’ बनाता है और इंटरनेशनल मीडिया कवरेज मिलता है. वहीं गुलदार का हमला ‘लोकल समस्या’ मानी जाती है, जिसे राज्य सरकारों पर छोड़ दिया जाता है. नतीजा यह है कि जहां चीता के एक शावक के जन्म पर पूरे देश को खबर होती है, वहीं महाराष्ट्र के एक गांव में तीन बच्चों की मौत के बाद भी राष्ट्रीय स्तर पर उतना शोर नहीं होता है.



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