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कौन थी वह मुगल रानी जिसे 3 बार दफनाया! वजह जानकर हो जाएंगे हैरान
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कौन थी वह मुगल रानी जिसे 3 बार दफनाया! वजह जानकर हो जाएंगे हैरान

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मुगल इतिहास में कई प्रेम कहानियां दर्ज हैं, लेकिन शाहजहां और मुमताज महल की कहानी सबसे प्रसिद्ध है. आगरा का ताजमहल जिसे प्रेम का प्रतीक कहा जाता है, इस गहरी मोहब्बत और वफादारी का स्थायी स्मारक है. मुमताज महल का असली नाम अर्जुमंद बानो बेगम था. वह शाहजहां की 13वीं पत्नी थीं. इतिहासकारों के अनुसार शाहजहां ने कई शादियां कीं, लेकिन मुमताज से उनका प्यार सबसे सच्चा था. इतालवी इतिहासकार निकोलाओ मनूची के अनुसार, शाहजहां अपने शासन कार्यों से अधिक समय मुमताज के साथ बिताते थे और वे राज्य कार्यों में भी उनका सहयोग करती थीं.

साल 1631 में मुमताज महल अपने 14वें बच्चे को जन्म देते समय गंभीर रूप से बीमार हो गईं. करीब 30 घंटे की प्रसव पीड़ा के बाद 17 जून 1631 को उन्होंने अंतिम सांस ली. मरने से पहले उन्होंने शाहजहां से दो वादे लिए पहला वे किसी दूसरी महिला से संतान नहीं पैदा करेंगे. दूसरा उनकी याद में एक सुंदर बाग और मकबरा बनवाएंगे, ताकि लोग उनके प्रेम को याद रखें. शाहजहां ने दोनों वादे निभाए. वो जीवन भर मुमताज की याद में अकेले रहे और उनकी याद में ताजमहल बनवाया.

पहली बार दफन बुरहानपुर में
मुमताज महल की मृत्यु मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में हुई थी, जहां शाहजहां मुगल सेना के अभियान पर थे. उन्हें वहीं तप्‍ती नदी के किनारे एक सुंदर बगीचे में अस्थायी रूप से दफनाया गया. शाहजहां ने वहीं एक स्थायी मकबरा बनाने का विचार किया था, लेकिन भूमि और नदी की दिशा अनुकूल न होने के कारण यह योजना बदल दी गई.

दूसरी बार दफन आगरा में यमुना किनारे
कुछ महीनों बाद शाहजहां ने आदेश दिया कि मुमताज का पार्थिव शरीर आगरा लाया जाए. 8 जनवरी 1632 को उन्हें यमुना नदी के किनारे आगरा किले के पास फिर से दफनाया गया. यह उनका दूसरा अस्थायी विश्राम स्थल था, लेकिन शाहजहां का मन अब भी अशांत था. वह मुमताज के लिए एक ऐसा मकबरा बनाना चाहते थे, जो हमेशा उनके प्रेम की पहचान बने.

तीसरी बार दफन ताजमहल में
शाहजहां ने तीसरी बार मुमताज के लिए एक स्थायी मकबरे के निर्माण का फैसला लिया. उन्होंने ईरानी वास्तुकार मुकम्मत खां जहांगीर को निर्माण कार्य की जिम्मेदारी दी. यमुना किनारे एक विशाल परिसर की नींव रखी गई, जिसे उस समय रौजा-ए-मुनव्वरा कहा गया. यही आगे चलकर ताजमहल के नाम से प्रसिद्ध हुआ. मुमताज का पार्थिव शरीर बड़ी श्रद्धा के साथ ताजमहल के मुख्य गुंबद के नीचे दफनाया गया. बाद में शाहजहां की मृत्यु के बाद उन्हें भी मुमताज की कब्र के पास ही दफन किया गया.

ताजमहल का निर्माण
शाहजहां ने मुमताज से किया हर वादा निभाया. उन्होंने उनकी याद में एक ऐसा मकबरा बनवाया, जो दुनिया का अजूबा बन गया. इतिहासकार इनायत खान अपनी किताब शाहजहांनामा में लिखते हैं कि जब तक ताजमहल का निर्माण पूरा नहीं हुआ, शाहजहां बेचैन रहते थे. जैसे ही यह तैयार हुआ उन्हें लगा कि अब उनका वादा पूरा हो गया. ताजमहल का निर्माण 1632 से 1648 के बीच हुआ. यह पूरी तरह सफेद संगमरमर से बना है और इसकी नक्काशी व जड़ाई आज भी दुनिया को चकित करती है.

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