इन दिनों आप सुबह चाय बनाते वक्त महसूस करते हैं कि चीनी, गैस और तेल महंगा हो गया है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि शाम को जो कंडोम का पैकेट आप इस्तेमाल करते हैं, उसकी कीमत भी ईरान युद्ध की वजह से बढ़ सकती है? जी हां. मिडिल ईस्ट वॉर की वजह से अप्रैल 2026 में भारत का कंडोम उद्योग संकट में आ गया है. 860 मिलियन डॉलर यानी करीब 8,000 करोड़ रुपये का यह सेक्टर अब कच्चे माल की भारी कमी और तेजी से बढ़ती कीमतों से जूझ रहा है. लेकिन कैसे? आइए समझते हैं एक्सप्लेनर में…
सवाल 1: US-ईरान जंग का असर कंडोम से कैसे जुड़ गया?
जवाब: अमेरिका-ईरान जंग और होर्मुज स्ट्रेट बंद होने की वजह से पेट्रोकेमिकल्स की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है. कंडोम बनाने में दो सबसे जरूरी चीजें हैं- सिलिकॉन ऑयल और अमोनिया.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सिलिकॉन ऑयल की भारी किल्लत है, जिससे बाजार में उथल-पुथल मच गई है. अमोनिया की कीमत में 40-50 प्रतिशत का उछाल आने वाला है. पैकिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले PVC फॉयल, एल्युमिनियम फॉयल और दूसरे मटेरियल भी महंगे हो गए हैं. लॉजिस्टिक्स में रुकावट ने ऑर्डर पूरा करना और मुश्किल बना दिया है.
सवाल 2: भारत में कंडोम का कारोबार कितना बड़ा है?
जवाब: भारत में हर साल करीब 400 करोड़ कंडोम बनते हैं. देश की सबसे बड़ी सरकारी कंपनी HLL लाइफकेयर लिमिटेड अकेले हर साल करीब 221 करोड़ कंडोम बनाती है. इसके अलावा Mankind Pharma Ltd और Cupid Ltd जैसे प्राइवेट प्लेयर भी इस संकट से बुरी तरह प्रभावित हैं. एक कंडोम कंपनी के अधिकारी ने बताया, सप्लाई बाधित होने और कच्चे माल की कीमतों ने प्रोडक्शन और ऑर्डर एक्जीक्यूशन दोनों को प्रभावित किया है.’
कर्नाटक ड्रग्स एंड फार्मास्यूटिकल्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के जतिश एन. शेठ कहते हैं, ‘हर पेट्रोकेमिकल्स वाला मटेरियल प्रभावित हो रहा है. हम प्रभावित तो हैं, लेकिन अभी असर की गहराई का आकलन कर रहे हैं.’
सवाल 3: कंडोम आखिर बनता कैसे है, जो जंग का असर पड़ रहा?
जवाब: ज्यादातर कंडोम नेचुरल रबर के लेटेक्स यानी रबर के पेड़ों से निकलने वाले दूध से बनते हैं. पहले के जमाने में लेटेक्स को छोटे टुकड़ों में काटकर पेट्रोल में घोलते थे. यह तरीका खतरनाक था और फैक्ट्री में धमाके भी हो जाते थे. इस वजह से अब तरीका बदल गया है.
आज का बेहतर तरीका: लेटेक्स में अमोनिया मिलाकर गाढ़ा किया जाता है. इससे पानी कम खर्च होता है, लेटेक्स तरल रहता है और आसानी से ट्रांसपोर्ट हो जाता है. आगे प्रोसेसिंग में जब इसे गर्म किया जाता है तो अमोनिया भाप बनकर उड़ जाता है. आजकल एक लीटर लेटेक्स से करीब 700 कंडोम बनाए जा सकते हैं.

कंडोम के प्रोडक्शन को स्टेप बाय स्टेप समझते हैं:
- ग्लास के मोल्ड (सांचे) को 20-30 डिग्री तापमान वाले लेटेक्स में डुबोया जाता है. लेटेक्स में 60% रबर सैप, 38.5% पानी और 1.5% सल्फर या जिंक ऑक्साइड मिला होता है.
- ड्राई करने के बाद फिर डुबोया जाता है. इस तरह कई बार डुबोकर 0.03 से 0.08 मिलीमीटर मोटाई की पतली रबर फिल्म बनाई जाती है.
- ब्रश की मदद से खुले सिरे पर रिम (किनारा) बनाया जाता है.
- 110-130 डिग्री गर्म हवा में सख्त किया जाता है, जिससे रबर मजबूत और लचीला हो जाता है.
- पानी में सिलिकॉन ऑयल और पाउडर मिलाकर धोया जाता है, ताकि कंडोम चिपचिपे न रहें. फिर 85 डिग्री पर सुखाया जाता है.
- कंडोम को इलेक्ट्रोलाइट सॉल्यूशन में डुबोकर चेक किया जाता है. अगर कोई छोटा सा छेद भी हो तो बिजली बह जाती है और लैंप जल जाता है. वो कंडोम फेंक दिया जाता है.
- रैंडम चेक में लीक टेस्ट, इन्फ्लेशन टेस्ट, खिंचाव टेस्ट और माइक्रोबायोलॉजिकल टेस्ट किए जाते हैं.
हर स्टेप इतना सटीक है कि अगर अमोनिया या सिलिकॉन ऑयल की कमी हो जाए तो पूरी लाइन रुक सकती है.
सवाल 4: तो क्या अब आम लोगों को महंगे कंडोम खरीदने पड़ेंगे?
जवाब: 11 मार्च 2026 को केंद्र सरकार ने इंटर-मिनिस्ट्रीरियल मीटिंग में फैसला लिया कि पेट्रोकेमिकल यूनिट्स को 35 प्रतिशत कम संसाधन दिए जाएंगे, ताकि ज्यादा जरूरी सेक्टर बचाए जा सकें. इससे कंडोम जैसे हाई-वॉल्यूम, लो-मार्जिन प्रोडक्ट और दबाव में आ गए हैं.
कंडोम इंडस्ट्री हाई वॉल्यूम पर चलती है ताकि 140 करोड़ लोगों तक सस्ते कंडोम पहुंच सकें. कंडोम कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारियों का कहना है कि कीमतें बढ़ाने से रेवेन्यू तो बढ़ सकता है, लेकिन सेल्स की संख्या घट जाएगी.
अगर होर्मुज स्ट्रेट की रुकावटें कम हुईं तो शायद राहत मिले, वरना अगले कुछ महीनों में दुकानों पर कंडोम की उपलब्धता और कीमत दोनों प्रभावित हो सकती हैं. सुरक्षित रहना सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि अब ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स से भी जुड़ गया है.
सवाल 5: तो फिर इससे परिवार नियोजन और समाज पर भी असर पड़ेगा?
जवाब: भारत में कंडोम परिवार नियोजन और जनसंख्या कंट्रोल करने का अहम हिस्सा हैं. अगर उपलब्धता घटी या कीमत बढ़ी तो इस्तेमाल कम हो सकता है, खासकर गरीब लोगों में. इंडस्ट्री वाले चेतावनी दे रहे हैं कि इससे लंबे समय में सामाजिक प्रभाव पड़ सकता है.
ईरान इस किल्लत से वाकिफ रहा है. अक्सर जंग के दौरान ईरान में कंडोम का भरपूर स्टॉक होता है. ईरान के सबसे बड़े ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म दिगीकला के आंकड़ों के अनुसार, जून 2025 में इजरायल के साथ हुए 12 दिवसीय संघर्ष के दौरान ईरान में कंडोम की खरीद में 26% की वृद्धि हुई थी.


