स्कूलों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ गाने से जुड़ी केंद्र सरकार की अधिसूचना के खिलाफ याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है. कोर्ट ने याचिका को आशंकाओं पर आधारित बताया. जजों का कहना था कि अधिसूचना सिर्फ एक सलाह की तरह है. सरकार ने राष्ट्रीय गीत गाना अनिवार्य नहीं किया है. अगर भविष्य में किसी को इस अधिसूचना के आधार पर कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ता है, तो वह कोर्ट आ सकता है.
चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच ने कहा, ‘क्या इस अधिसूचना का पालन न करने पर कोई सजा तय की गई है? क्या ऐसा हुआ है कि किसी व्यक्ति को राष्ट्रीय गीत न गाने के लिए किसी कार्यक्रम से निकाल दिया गया?’ इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 28 जनवरी को जारी गृह मंत्रालय का नोटिफिकेशन सिर्फ एक ‘प्रोटोकॉल’ है. इसे पढ़ कर यही लग रहा है कि नागरिकों को गीत गाने या न गाने की समान स्वतंत्रता दी गई है.
याचिकाकर्ता मोहम्मद सईद नूरी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने कहा, ‘भले ही कोई कानूनी सजा न हो, लेकिन जो व्यक्ति गीत को गाने या उसे गाए जाने के दौरान खड़ा होने से इनकार करेगा, उस पर भारी सामाजिक बोझ होगा. एडवाइजरी की आड़ में लोगों को गाने के लिए मजबूर किया जा सकता है.’
हेगड़े ने कहा कि देशभक्ति थोपी नहीं जा सकती. जिस तरह से अधिसूचना जारी की गई है, वह लोगों को देश के प्रति वफादारी का सार्वजनिक प्रदर्शन करने के लिए बाध्य करने जैसा है. जो ऐसा नहीं करेगा, वह दिक्कत में आ जाएगा. इस दलील को अस्वीकार करते हुए पर चीफ जस्टिस ने कहा कि याचिका सिर्फ अस्पष्ट आशंका के आधार पर दाखिल कर दी गई है.
हेगड़े ने यह सवाल भी उठाया कि सरकार की एडवाइजरी में ‘वंदे मातरम’ के सभी छह छंदों को गाने की बात कही गई है, जबकि संविधान सभा ने इसके कुछ छंदों को ही राष्ट्रीय गीत के तौर पर पारित किया था. 6 छंदों का गीत लगभग 3 मिनट का है, जो कि राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ से बहुत बड़ा है.
इस चर्चा को जजों ने गैरजरूरी बताया. उन्होंने सुनवाई से मना करते हुए याचिका को समय से पहले दाखिल ‘अपरिपक्व याचिका’ कहा. कोर्ट ने कहा कि मामले पर तब विचार किया जाएगा, जब राष्ट्रीय गीत गाने को अनिवार्य बनाया जाए या इसके उल्लंघन पर कोई सजा तय हो.


