मासिक धर्म से जुड़ी तकलीफों को देखते हुए महिला कर्मचारियों को अवकाश देने का प्रावधान बनाने की मांग सुनने से सुप्रीम कोर्ट ने मना किया. कोर्ट ने कहा कि इस तरह की अनिवार्य व्यवस्था महिलाओं के लिए नौकरी पाना मुश्किल बना सकती है. इस विषय को सरकार पर छोड़ देना बेहतर होगा. केंद्र सरकार सभी संबंधित पक्षों से चर्चा कर कोई व्यवस्था बना सकती है.
चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा, ‘महिलाओं को इतना कमजोर मत समझिए. आपकी मांग सुनने में सही लग सकती है, लेकिन यह महिलाओं का नुकसान ही करेगी. अगर पेड पीरियड लीव को अनिवार्य किया गया, तो कोई उन्हें नौकरी नहीं देना चाहेगा.’
इसके बाद बेंच ने कहा कि इस तरह की अनिवार्यता का असर न्यायिक सेवाओं में भी पड़ सकता है. इससे महिला जज को कोई मुकदमा दे पाना मुश्किल हो जाएगा. इसके बाद कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने सरकार को ज्ञापन दिया है. वह सभी संबंधित सरकारों और संस्थाओं से चर्चा कर कुछ व्यवस्था बना सकती है.
इससे पहले 24 फरवरी 2023 को भी सुप्रीम कोर्ट ने याचिका करता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की याचिका को सुनने से मना किया था. तब कोर्ट ने कहा था कि यह एक नीतिगत मसला है. इसके लिए महिला और बाल विकास मंत्रालय को ज्ञापन दिया जाना चाहिए. याचिकाकर्ता ने यह कहते हुए दोबारा सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था कि सरकार ने उसके ज्ञापन पर अभी तक कोई फैसला नहीं लिया है.
याचिका में कहा गया था कि महिलाओं को गर्भावस्था के लिए अवकाश मिलता है, लेकिन मासिक धर्म के लिए नहीं. यह भी महिलाओं के शारिरिक और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा एक अहम विषय है. बिहार समेत कुछ राज्यों ने महीने में 2 दिन छुट्टी का प्रावधान बनाया है. हर राज्य को ऐसे नियम बनाने का निर्देश दिया जाए या फिर केंद्रीय स्तर पर इसके लिए कानून पारित हो. याचिका में यूनाइटेड किंगडम, जापान, ताइवान जैसे कई देशों में महिलाओं को माहवारी के दौरान छुट्टी देने के लिए बने कानूनों का हवाला भी दिया गया था.
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