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‘म्यांमा के नेतृत्व वाली और इसकी अपनी शांति प्रक्रिया का समर्थन करता है भारत’, जयशंकर ने कहा
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‘म्यांमा के नेतृत्व वाली और इसकी अपनी शांति प्रक्रिया का समर्थन करता है भारत’, जयशंकर ने कहा

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विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने बुधवार (4 मार्च, 2026) को कहा कि भारत, म्यांमा के नेतृत्व वाली और उसकी अपनी शांति प्रक्रिया का समर्थन करता है, जो दक्षिण-पूर्वी एशियाई देश में सभी के लिए स्थायी शांति और विकास सुनिश्चित कर सकती है.

विदेश मंत्री ने म्यांमा के साथ अपने संबंधों के महत्व पर भी प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि यह दक्षिण-पूर्वी एशियाई देश भारत की तीन प्रमुख विदेश नीति की प्राथमिकताओं के संगम पर स्थित है, जिनमें पड़ोसी पहले, एक्ट ईस्ट और ‘महासागर नीति’ शामिल है. म्यांमा, भारत के रणनीतिक पड़ोसियों में से एक है और यह उग्रवाद प्रभावित नगालैंड और मणिपुर समेत पूर्वोत्तर के कई राज्यों के साथ करीब 1,640 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है.

एक फरवरी, 2021 को सेना की ओर से तख्तापलट करके सत्ता हथियाने के बाद से देश में व्यापक हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं. सेना समर्थित पार्टी ने म्यांमा के हालिया आम चुनाव में जीत हासिल की. डॉ. एस. जयशंकर यांगून के मध्य में स्थित सरसोबेकमान साहित्यिक केंद्र भवन के उद्घाटन समारोह को वर्चुअल माध्यम से संबोधित कर रहे थे. इस भवन का निर्माण भारत की सहायता से किया गया है.

उन्होंने कहा, ‘दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में, जहां 14 लाख लोग शांति और सद्भाव से एक साथ रहते हैं, भारत ने म्यांमा के हितधारकों के साथ संघवाद और संवैधानिक व्यवस्था से संबंधित अपने अनुभव नियमित रूप से साझा किए हैं.’

उन्होंने कहा, ‘हम एक समावेशी, म्यांमा के नेतृत्व वाली और इसकी अपनी शांति प्रक्रिया का समर्थन करते हैं, जो देश में सभी के लिए स्थायी शांति और विकास सुनिश्चित कर सके.’ जयशंकर ने कहा कि सरसोबेकमान केंद्र म्यांमा के शास्त्रीय एवं लोक साहित्य के संरक्षण और अध्ययन के साथ-साथ अनुवाद, अभिलेखीय कार्य, रचनात्मक लेखन और विद्वानों के परस्पर संपर्क में सहयोग करेगा.

उन्होंने कहा, ‘म्यांमा हमारी तीन प्रमुख विदेश नीति प्राथमिकताओं – पड़ोस प्रथम, एक्ट ईस्ट और महासागर (जिसमें हिंद-प्रशांत क्षेत्र भी शामिल है) – के संगम पर स्थित है.’ विदेश मंत्री ने कहा, ‘हमारी बहुआयामी भागीदारी में राजनीतिक, व्यापार, सुरक्षा और सांस्कृतिक सहयोग शामिल है. विकास सहयोग की बात करें तो म्यांमा के साथ हमारी भागीदारी जन-केंद्रित और मांग-आधारित रही है, जिसका उद्देश्य स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत करना और जीवन स्तर में सुधार लाना है.’

जयशंकर ने कहा कि भारत और म्यांमा सदियों से आध्यात्मिकता, रिश्तेदारी और भूगोल के साथ-साथ भाषा एवं साहित्य से भी जुड़े हुए हैं. उन्होंने कहा, ‘जैसे-जैसे बौद्ध धर्म तथा पाली भाषा एवं साहित्य दक्षिण एशिया में फैले, वे अपने साथ विचार, ग्रंथ और एक साझा बौद्धिक विरासत लेकर गए.’



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