Om Birla News: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भारतीय संसदीय कूटनीति को एक नई दिशा और वैश्विक विस्तार देने के लिए संसद में “फ्रेंडशिप ग्रुप्स” के गठन की घोषणा की है. इस पहल की सबसे खास बात इसकी समावेशी संरचना है, जिसमें युवा सांसदों से लेकर 80 साल तक के दिग्गज नेताओं को कमान सौंपी गई है.
लोकसभा अध्यक्ष की इस योजना के तहत जहां एक ओर श्रीकांत शिंदे जैसे युवा चेहरों को आगे लाया गया है, वहीं दूसरी ओर पी. चिदंबरम जैसे अनुभवी और वरिष्ठ नेताओं को भी अहम जिम्मेदारी दी गई है. यह कदम संसद के भीतर ‘पीढ़ियों के सेतु’ के रूप में देखा जा रहा है.
अनुभव और ऊर्जा का अनूठा मेल
युवा सांसद: नई सोच, आधुनिक तकनीक और वैश्विक दृष्टिकोण के साथ नवाचार लाएंगे.
वरिष्ठ नेता: संसदीय परंपराओं, जटिल कूटनीतिक बारीकियों और दशकों के अनुभव से मार्गदर्शन करेंगे.
क्या हैं फ्रेंडशिप ग्रुप्स और क्यों हैं खास?
संसदीय फ्रेंडशिप ग्रुप्स दरअसल ऐसे अनौपचारिक मंच हैं जो दो देशों के सांसदों के बीच संवाद का जरिया बनते हैं. औपचारिक सरकारी माध्यमों से इतर, ये समूह ‘पीपुल-टू-पीपुल’ कनेक्ट और व्यक्तिगत रिश्तों पर जोर देते हैं.
द्विपक्षीय मजबूती: विभिन्न देशों के साथ राजनीतिक और सांस्कृतिक संबंधों को प्रगाढ़ करना.
सॉफ्ट पावर का विस्तार: वैश्विक मंच पर भारत की संस्कृति, कला और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रचार.
मेंटरशिप कल्चर: पहली बार सांसद बने युवाओं को अनुभवी दिग्गजों के साथ काम करने का अवसर देना.
वैश्विक चुनौतियां: जलवायु परिवर्तन, व्यापार और तकनीक जैसे विषयों पर साझा रुख तैयार करना.
दलगत राजनीति से ऊपर भारत का हित
इन समूहों का गठन किसी दल विशेष को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखकर किया गया है. सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों के नेताओं को इन समूहों की अगुवाई सौंपकर ओम बिरला ने यह संदेश दिया है कि जब बात अंतरराष्ट्रीय संबंधों और भारत के प्रतिनिधित्व की आती है, तो भारतीय लोकतंत्र एक स्वर में बोलता है. यह पहल केवल कूटनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय संसद के भीतर एक ऐसी संस्कृति विकसित करने का प्रयास है जहां अनुभव का सम्मान और युवाओं का उत्साह एक साथ मिलकर देश को वैश्विक पटल पर मजबूती दे सकें.”
‘फ्रेंडशिप ग्रुप्स’ के माध्यम से भारत अब अपनी संसदीय गरिमा को दुनिया के अन्य देशों के साथ साझा करने और आपसी सहयोग के नए द्वार खोलने के लिए तैयार है. यह मॉडल न केवल विदेश नीति में मददगार साबित होगा, बल्कि आने वाले समय में सांसदों के बीच एक रचनात्मक और सहयोगी माहौल भी तैयार करेगा.


