नई दिल्ली के प्रेस क्लब में दिल्ली दंगों के छह साल पूरे होने पर “Lest We Forget” नाम से एक स्मृति कार्यक्रम आयोजित किया गया. यह कार्यक्रम कांस्टीट्यूशनल कंडक्ट ग्रुप और कारवां-ए-मोहब्बत की ओर से रखा गया था. कार्यक्रम में कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद, राजद सांसद मनोज झा, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मदन बी लोकुर और सीपीआई नेता वृंदा करात समेत कई लोग मौजूद रहे.
सलमान खुर्शीद ने कई मुद्दों पर की चर्चा
पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कई अहम मुद्दों पर अपनी बात रखी. बाद में एबीपी न्यूज़ से बातचीत में उन्होंने कहा कि उमर खालिद और शरजील के मामले में आम लोगों के बीच इंसानी हमदर्दी देखने को मिलती है. उनके अनुसार इन लोगों ने ‘बेवजह काफी मुश्किलें झेली हैं.’
सलमान खुर्शीद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों को देखने के बाद यह सवाल उठता है कि जिन मामलों में बहुत ठोस आधार नहीं दिखता, उनमें इतना लंबा समय क्यों लग जाता है. उन्होंने इसे व्यवस्था पर बड़ा सवाल बताया. उनका कहना था कि हमारे लीगल सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है.
महात्मा गांधी हमेशा सभ्य संवाद करते थे: सलमान खुर्शीद
उन्होंने महात्मा गांधी का उदाहरण देते हुए कहा कि गांधी जी हमेशा सभ्य संवाद (civilised conversation) की बात करते थे. आज जरूरत है कि समाज भावनाओं में बहने के बजाय शांतिपूर्ण और तार्किक बातचीत करे. उन्होंने कहा कि लोगों का दर्द और शिकायतें दूर करना जरूरी है, लेकिन साथ ही सिस्टम में बदलाव लाना भी उतना ही आवश्यक है.
सलमान खुर्शीद ने यह भी कहा कि कई मामलों में बड़ी संख्या में लोगों के खिलाफ मुकदमे चल रहे हैं. उनके अनुसार मूल समस्या सिस्टम की है. उन्होंने पुराने दंगों का जिक्र करते हुए कहा कि कई बार ऐसा भी हुआ है, जब पुलिस पर ही हिंसा में शामिल होने के आरोप लगे, जैसे मुंबई और गुजरात दंगों के समय। ऐसे हालात में जनता का भरोसा कमजोर होता है.
लोकतंत्र और भीड़तंत्र में फर्क है: खुर्शीद
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र और भीड़तंत्र (mob rule) में यही फर्क है कि लोकतंत्र में कानून और न्याय की मजबूती जरूरी होती है. न्यायपालिका की भूमिका पर बोलते हुए उन्होंने अमेरिका का उदाहरण दिया, जहां ट्रम्प द्वारा नियुक्त जजों ने भी उनके खिलाफ फैसले दिए. इसे उन्होंने न्यायपालिका की स्वतंत्रता का उल्लेखनीय उदाहरण बताया. धर्म के आधार पर गलत होने के सवाल पर उन्होंने कहा कि असली समस्या सिस्टम की है. उनके अनुसार कई बार लोग भावनाओं में आकर सही और गलत का फर्क भूल जाते हैं. कार्यक्रम में मौजूद अन्य वक्ताओं ने भी न्याय, जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा पर जोर दिया.


