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तेलंगाना नगर निकाय चुनाव: ‘कांग्रेस एजेंट’ बने पुलिसकर्मी? बांसवाड़ा और चिट्याल में पैसे बांटने
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तेलंगाना नगर निकाय चुनाव: ‘कांग्रेस एजेंट’ बने पुलिसकर्मी? बांसवाड़ा और चिट्याल में पैसे बांटने

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तेलंगाना के बांसवाड़ा और चिट्याल में उस समय मतदान केंद्रों पर हड़कंप मच गया, जब मतदाताओं और विपक्षी कार्यकर्ताओं ने पुलिसकर्मियों पर खुलेआम कांग्रेस पार्टी के पक्ष में प्रचार करने और रुपये बांटने का गंभीर आरोप लगाया. चुनावी नैतिकता को दांव पर लगाते हुए पुलिस के एक सब-इंस्पेक्टर (SI) तक कथित तौर पर मतदाताओं को संबोधित करते हुए नजर आए, जिससे पूरे राज्य में सियासी तूफान खड़ा हो गया है.

बांसवाड़ा और चिट्याल म्यूनिसिपलिटी में दिखे मामले

बांसवाड़ा म्युनिसिपलिटी के 9वें वार्ड में स्थिति तब तनावपूर्ण हो गई, जब बीआरएस (BRS) कार्यकर्ताओं ने एक पुलिस कांस्टेबल को रोका. आरोप है कि यह कांस्टेबल मतदाताओं को कांग्रेस को वोट देने की सलाह दे रहा था. विपक्षी कार्यकर्ताओं का कहना है कि पुलिस जिसे कानून व्यवस्था बनाए रखनी चाहिए थी, वही आज एक राजनीतिक दल का एजेंट बनकर खड़ी दिखी.

वहीं, चिट्याल म्युनिसिपलिटी के पहले वार्ड में मामला और भी गंभीर हो गया, जहां अन्य दलों के कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि कांग्रेस उम्मीदवार खुलेआम नकदी बांट रहा है और पुलिस मौन दर्शक बनी हुई है.

प्रशासनिक मशीनरी खुलेआम भ्रष्टाचार को दे रही बढ़ावा

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाला खुलासा एक एसआई का कथित बयान चर्चा का विषय बना हुआ है. सूत्रों के अनुसार, इस अधिकारी ने मतदाताओं को सीधे तौर पर संबोधित करते हुए कहा, ‘अगर वे (विपक्ष) आपको 4,000 रुपये दे रहे हैं, तो आप हमसे (कांग्रेस) 5,000 रुपये ले लो.’ यह बयान न केवल भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाला है, बल्कि यह दर्शाता है कि किस तरह से प्रशासनिक मशीनरी का राजनीतिक दलों की ओर से इस्तेमाल किया जा रहा है.

चुनाव आयोग के लिए चुनौती बनी घटना

यह घटना उस समय सामने आई है, जब तेलंगाना में कांग्रेस सरकार बनने के बाद पहली बार स्थानीय निकाय चुनाव हो रहे हैं. पिछले कई महीनों से बीआरएस और अन्य विपक्षी दल पुलिस विभाग पर कांग्रेस का पक्ष लेने का आरोप लगाते आ रहे हैं. बांसवाड़ा बीआरएस का गढ़ माना जाता है और यहां ऐसी घटनाएं पुरानी सरकारी तंत्र के दबाव में आने का संकेत देती हैं.

चुनाव आयोग के लिए यह एक बड़ी चुनौती बन गई है. यदि मतदाताओं को डराया या लुभाया जाता है, तो लोकतंत्र का मतलब ही खत्म हो जाता है. जमीनी हकीकत यह है कि आम आदमी न्याय चाहता है, न कि नोट की राजनीति. अब देखना यह है कि आयोग इन यूनिफॉर्म वाले नेताओं पर क्या कार्रवाई करता है.



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